News Wave Desk:कभी घर-घर में पहनी जाने वाली तमिल ब्राह्मण महिलाओं की 9 गज की पारंपरिक ‘मडिसार’ साड़ी अब सिर्फ रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं रही. शादियों,और मंदिर उत्सवों में इसकी मांग फिर से बढ़ रही है.
क्या है मडिसार का खास ड्रेपिंग स्टाइल?
मडिसार को ‘कोशवम’ स्टाइल में बांधा जाता है. इसमें साड़ी को धोती की तरह पैरों के बीच से ले जाकर पीछे टक किया जाता है. अय्यर समुदाय की महिलाएं पल्लू दाएं कंधे पर और अयंगर बाएं कंधे पर डालती हैं. पारंपरिक रूप से यह बिना पेटीकोट के पहनी जाती है.


धार्मिक मान्यता और प्रतीक
धार्मिक मान्यता है कि मडिसार पहनने से अष्टलक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है. शादी में दुल्हन लाल-सफेद चेक वाली ‘कूराई पुडवै’ मडिसार पहनती है. लाल रंग शक्ति और उर्वरता का, वहीं सफेद चेक पवित्रता का प्रतीक माने जाते हैं. इस साड़ी को ‘अर्धनारीश्वर’ का रूप भी कहा जाता है, क्योंकि ऊपर का हिस्सा साड़ी और नीचे का हिस्सा धोती जैसा दिखता है.
इतिहास से आज तक का सफर
पहले महिलाएं इसे रोज पहनती थीं क्योंकि इसमें काम करना आसान था. इतिहास में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भी 9 गज की साड़ी में युद्ध लड़ती थीं. लेकिन समय के साथ 6 गज की साड़ी का चलन बढ़ने से मडिसार सिर्फ विशेष मौकों तक सिमट गई.
युवा पीढ़ी का जुड़ाव

मडिसार सिर्फ कपड़ा नहीं, हमारी विरासत है. नई पीढ़ी का इसे अपनाना सुखद है. कई इंस्टाग्राम पेज अब मडिसार ड्रेपिंग की वर्कशॉप भी चला रहे हैं, जिससे यह परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंच रही है.
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