Ranchi: झारखंड की सियासत में मौसम विभाग की चेतावनियों से इतर एक अलग ही किस्म का उमस और दबाव का क्षेत्र विकसित हो चुका है. कारण राज्यसभा की दो खाली हो रही सीटें. निर्वाचन आयोग ने तारीखों का ऐलान कर दिया है, और इसके साथ ही रांची से लेकर दिल्ली तक के नेताओं के चेहरों पर वह मुस्कान तैरने लगी है जो केवल टिकट की महक से पैदा होती है. वैसे तो राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है, लेकिन वहां पहुंचने के लिए राजनीतिक पैंतरेबाज़ी होती है, वह किसी भी गली-मोहल्ले के दंगल को मात दे सकती है. झारखंड में इस बार की पटकथा बड़ी दिलचस्प है. कहानी में तीन किरदार हैं: एक वह जिसके पास नंबर है. दूसरा वह जो अपना हक मांग रहा है और तीसरा वह जिसके पास थाली खाली है.

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आंकड़ों का कैलकुलेटर और दावों की केमिस्ट्री
झारखंड विधानसभा के 81 सदस्यीय सदन में गणित कुछ ऐसा है कि राज्यसभा की एक सीट पर सीधे-सीधे वीटो पाने के लिए जादूई आंकड़ा 28 वोटों का है. आंकड़ों के इस आईने को देखें तो महागठबंधन के पास 56 का भारी-भरकम संख्या बल है. यानी तकनीकी तौर पर वे दोनों सीटें अपनी जेब में रखकर घूम रहे हैं. लेकिन, राजनीति का गणित न्यूटन के नियमों से नहीं, अपेक्षाओं के सिद्धांतों से चलता है.
बड़े भाई की भूमिका में झामुमो
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) इस समय बड़े भाई की भूमिका में है. झामुमो के पास अकेले 34 विधायक हैं, यानी एक सीट तो उनकी बिना किसी बैसाखी के पक्की है. दूसरी सीट के लिए उन्हें 22 और वोट चाहिए, जिसके लिए वे कांग्रेस के 16 और राजद-माले के वोटों पर टिकी है. झामुमो का तर्क बड़ा सीधा और भावुक है. दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर वे अपनी पारिवारिक और राजनीतिक विरासत को बरकरार रखना चाहते हैं. चर्चा है कि गुरुजी की विरासत अब उनकी सुपुत्री अंजनी सोरेन के कंधों पर डालने की तैयारी है. झामुमो के भीतर से आवाज आ रही है, जब मुख्यमंत्री हमारा, नंबर हमारे, तो दिल्ली जाने वाली ट्रेन की दोनों बोगियां भी हमारी ही होंगी. वे कांग्रेस को याद दिला रहे हैं कि भाई साहब, गठबंधन धर्म निभाना सीखिए, त्याग में ही असली आनंद है.
कांग्रेस का हक और धैर्य की परीक्षा
कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं. वे जानते हैं कि वे अपने दम पर एक भी सीट नहीं जीत सकते, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि उनके बिना झामुमो दूसरी सीट नहीं जीत सकती. गठबंधन की गरिमा के भरोसे कांग्रेस एक सीट पर अड़ी है. कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि पिछली बार भी उन्होंने बड़ा दिल दिखाया था, इस बार दिल छोटा किया तो दिल्ली में आलाकमान को क्या मुंह दिखाएंगे?
भाजपा की अंतरात्मा
भाजपा के पास अपने सिर्फ 21 विधायक हैं और सहयोगियों को मिलाकर भी वे 24 से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. जीत के लिए चाहिए 28. यानी पूरे 4 विधायक कम. लेकिन भाजपा के हौसले बुलंद हैं. उनके रणनीतिकार कह रहे हैं, “हम उम्मीदवार भी उतारेंगे और जीतेंगे भी. पर राजनीति में अंतरात्मा शब्द का इस्तेमाल तभी होता है जब या तो हॉर्स-ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) होने वाली हो या फिर क्रॉस-वोटिंग का अदृश्य टेंडर जारी हो चुका हो. भाजपा उम्मीद लगाए बैठी है कि झामुमो और कांग्रेस के बीच की रार इतनी बढ़ जाए कि कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट विधायक या झामुमो के नाराज गुट के लोग वोटिंग के दिन गलती से भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट कर दें.
एक नई पटकथा की तैयारी
यह चुनाव आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में एक नया अध्याय यानी नई पटकथा लिखने की तैयारी कर रहा है. विधानसभा चुनाव के बाद से ही गठबंधन के भीतर जो असहजता की बर्फ जमी थी, वह इस राज्यसभा चुनाव की गर्मी से पिघलकर बाढ़ का रूप ले सकती है. यदि झामुमो ने कांग्रेस की मांग को ठुकरा कर दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए, तो गठबंधन की गांठें ढीली होना तय है. इसका असर राज्य की सरकार और भविष्य के चुनावी तालमेल पर भी पड़ेगा. वहीं दूसरी ओर, अगर भाजपा का अंतरात्मा वाला फॉर्मूला काम कर गया, तो यह सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए एक ऐसा सियासी हालत ठीक नहीं होगी, जिसकी गूंज दूर तक जाएगी. बहरहाल 18 जून को होने वाली इस वोटिंग में वायलेट स्केच पेन से बैलेट पेपर पर जो निशान लगाए जाएंगे, वे सिर्फ किसी नेता की किस्मत नहीं, बल्कि झारखंड की गठबंधन सरकार के भविष्य का भाग्यफल भी लिखेंगे.
