होली पर प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. संजय कुमार यादव “योगी” की कलम से रंगों का घोष

रांची। हिंदी साहित्य के चर्चित और प्रसिद्ध रचनाकार डॉ. संजय कुमार यादव “योगी” ने होली के पावन अवसर पर अपनी नई कविता...

रांची। हिंदी साहित्य के चर्चित और प्रसिद्ध रचनाकार डॉ. संजय कुमार यादव “योगी” ने होली के पावन अवसर पर अपनी नई कविता प्रस्तुत की है, जिसने साहित्य जगत में खासा उत्साह पैदा कर दिया है। “आई रे होली” शीर्षक से रचित यह कविता रंग, उमंग, आध्यात्म और सामाजिक समरसता का अनूठा संगम है।

कवि “योगी” ने अपनी सशक्त और भावप्रवण शैली में होली को केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक बताया है। कविता की शुरुआत ही उल्लासपूर्ण पुकार से होती है— “आई रे होली…”— जो पाठक को सीधे उत्सव के रंगों में ले जाती है।

रचना में प्रह्लाद की अटूट भक्ति, होलिका दहन की कथा और नरसिंह अवतार का उल्लेख करते हुए कवि ने पौराणिक आधार को सुदृढ़ किया है। वहीं राम की मर्यादा और कृष्ण की ब्रज-लीला का रंगीन चित्रण कविता को सांस्कृतिक विस्तार प्रदान करता है। बरसाने की लठमार होली, ब्रज के गोपी-ग्वाल, कान्हा की मस्ती और फगुआ की धूम—इन सबका वर्णन पाठकों के सामने सजीव दृश्य उपस्थित कर देता है।

कविता में गुझिया-पापड़ की मिठास, भंग की मस्ती और गली-गली से निकली रंगों की टोलियाँ होली के लोक-जीवन को दर्शाती हैं। “योगी” ने प्रकृति को भी इस उत्सव में सहभागी बताया है— मानो वसुंधरा स्वयं रंगों से सजी मुस्कुरा उठी हो।

विशेष रूप से, कवि ने सामाजिक संदेश देते हुए जाति-भेद को समाप्त करने और मानवता-सौहार्द को अपनाने का आह्वान किया है। वे स्पष्ट कहते हैं कि होली का सच्चा अर्थ समरसता और प्रेम में है।

साहित्य प्रेमियों का मानना है कि डॉ. संजय कुमार यादव “योगी” की यह नवीन रचना होली के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आयामों को एक साथ समेटती है। उनकी लेखनी ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि वे समकालीन हिंदी काव्य जगत के सशक्त और लोकप्रिय हस्ताक्षर हैं।

कविता

आई,…रे…”होली”…आ…ई.!
आई…रे…आ…ई ..”होली”
सबके मन भा..ई…. होली ,
प्रेम और भाईचारा का पर्व “होली”
है , रंग-गुलाल का पर्व “होली”..’
‘होली की ये परंपरा सनातन
सबको सुनाएं..कथा पुरातन,
प्रहलाद की इबादत से
होलिका की शहादत तक
‘नरसिंह अवतार’ है ; ‘होली’
राम की कथा, कृष्ण की लीला,
अयोध्या हो या मथुरा का किला
सभी हैं प्रेम रंग में सराबोर और गीला
बरसाने मे राधा सगं लठमार,
ब्रज मे ‘गोपी-ग्वाल’ सगं
‘कान्हा’ खूब खेल रहे ‘होली’…!
‘अवध-ब्रज’ सहित……
अखिल विश्व में….’होली’ ..!
देखो-देखो, आई रे होली आई !
रंग बिरंगी खुशियां लाई होली ,
तरह-तरह के ‘रंग-गुलाल’ संग..
प्रकृति कर श्रृंगार,
ये वसुन्धरा भी देख, मुस्कुराई,
‘योगी’ के मन भी भाये ‘होली’…!
निकली गली-गली से दीवानों की टोली
एक हाथ मे रंग-गुलाल दूजे में पिचकारी,
हर किसी में है, जोश भरा..
कपड़े फाड़,बोल रहा ‘बम-बम’
खाएं गुझिया-पापड़ , पिए भंग
भौजी , देवर संग खूब खेल रहीं रंग
फगुआ में बाबा भी देवर लागे तो
मानो, होली आई..! आईं रे आई होली,
‘समरसता’ का पर्व ‘होली’
मानवता-सौहार्द की टोली,
“योगी” अब इस होली मिलन पर….
‘स्त्री-परुुष’ और ‘बालक-बालिका’
में भेद सही, पर जाति-जाति में भेद नहि!
देखो…! “योगी” इस होली में…
सुंदर रंगों से सजी ‘प्रेम-वाटिका’,
लाल, हरा, नीला, पीला ,
बैंगनी, गुलाबी और नारंगी
ना जाने कितने रंग लाई, ‘भाभी’..
बाबा गाये “फगआु ” चढ़ी बा खूब भंग!
कहै “योगी” आई रे.. आई ,’होली’ आईं!!

रचित; डॉ. संजय कुमार यादव “योगी”

 

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