रांचीः झारखंड के जल संसाधन विभाग की कई ऐसी बड़ी परियोजनाएं हैं, जिनकी उम्र अब वहां के युवाओं से भी ज्यादा हो चुकी है. 1970 और 80 के दशक में शुरू हुई ये योजनाएं आज भी निर्माणाधीन की श्रेणी में हैं. करोड़ों का बजट अरबों में तब्दील हो गया, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन न नहरों में पानी आया और न ही किसानों की तकदीर बदली. इन अधूरी योजनाओं ने न केवल सिंचाई के सपनों को तोड़ा है, बल्कि सरकारी उदासीनता की एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जो विकास के हर दावे पर सवालिया निशान लगाती है। न्यूज वेभ की खास रिर्पोट…
झारखंड की 10 बड़ी सिंचाई परियोजनाएं जो दशकों से अधूरी हैं
• उत्तर कोयल (मंडल डैम) परियोजना (पलामू): शुरुआत: 1972
स्थिति: करीब 54 साल पुरानी यह योजना झारखंड और बिहार के बीच अटकी रही. 1993 में काम रुक गया था, जिसे अब पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है.
• स्वर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना (कोल्हान): शुरुआत: 1970
स्थिति: झारखंड की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक, जो विस्थापन और आपसी समन्वय की कमी के कारण 45 साल बाद भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही है.
• कनहर जलाशय परियोजना (गढ़वा): शुरुआत: 1975 (शिलान्यास)
स्थिति: उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ अंतरराज्यीय विवाद के कारण यह योजना दशकों तक ठंडे बस्ते में रही.
• सुरु सिंचाई परियोजना (खरसावां):शुरुआत: 1986
स्थिति: इसका शिलान्यास दो बार हुआ (1986 और 2004), लेकिन 40 साल बाद भी यह चुनावी मुद्दा मात्र बनकर रह गई है.
• अजय बराज परियोजना (देवघर/दुमका):शुरुआत: 1975
स्थिति: करीब 50 साल बीत जाने के बाद भी इसकी मुख्य नहरों और वितरण प्रणालियों का काम पूरी तरह संपन्न नहीं हो पाया है.
• तोरई बराज परियोजना (दुमका):शुरुआत: 1978
स्थिति: संथाल परगना की यह महत्वपूर्ण योजना 46 साल बाद भी शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी है.
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• सकरी गली पंप योजना (साहिबगंज):शुरुआत: 1978
स्थिति: गंगा नदी से पानी उठाने की यह महत्वाकांक्षी योजना लगभग 48 वर्षों से तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं से जूझ रही है.
• बटाने जलाशय परियोजना (पलामू): शुरुआत: 1981
स्थिति: सूखाग्रस्त पलामू के लिए यह वरदान साबित होनी थी, लेकिन 45 साल बाद भी किसान आसमान की ओर ही देखते हैं.
• अपर शंख जलाशय परियोजना (गुमला):शुरुआत: 1987.
स्थिति: विस्थापन की समस्या और वन भूमि अनापत्ति के कारण यह योजना करीब 39 साल से अधर में है।
• भैरव जलाशय परियोजना (रामगढ़/हजारीबाग):शुरुआत: 1984
स्थिति: 42 साल बीत जाने के बाद भी नहरों का नेटवर्क अधूरा होने के कारण इसका पूरा लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा है.
योजनाओं में देरी की क्या हैं वजहें
• विस्थापन और पुनर्वास: जमीन अधिग्रहण को लेकर स्थानीय ग्रामीणों का विरोध.
• वन भूमि अनापत्ति: परियोजनाओं का एक बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र में होने के कारण केंद्र से मंजूरी में देरी.
• बजट में बढ़ोतरी: 25-30 साल की देरी से परियोजनाओं की लागत 10 करोड़ से बढ़कर 500 करोड़ तक पहुंच गई.
• राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: सरकारों के बदलने के साथ प्राथमिकताओं का बदलना.
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