SAURAV SINGH
रांची: एक दौर था जब झारखंड की पहचान ‘लाल गलियारे के केंद्र के रूप में होती थी. शाम ढलते ही राज्य के एक तिहाई जिलों में सन्नाटा पसर जाता था और रेल पटरियों से लेकर सरकारी भवनों तक पर माओवादी हिंसा का साया रहता था. ढाई दशक में 841 आम नागरिक के जान गंवाने, 851 नक्सलियों के मारे जाने और 556 जवानों के शहीद होने के बाद झारखंड में लाल आतंक पर पूर्ण विराम लगने जा रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की सटीक रणनीति और खुफिया-आधारित ऑपरेशनों ने पासा पलट दिया है.
खौफनाक मंजर: जब दहल उठा था झारखंड:
* चिलखारी नरसंहार (2007): गिरिडीह में नक्सलियों ने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे समेत 20 मासूमों की बेरहमी से हत्या कर दी थी.
– भंडरिया विस्फोट (2012): गढ़वा जिले में बारूदी सुरंग के जरिए 13 जवानों को शहीद कर दिया गया.
– तिरुलडीह हमला (2019): सरायकेला में घात लगाकर किए गए हमले में 5 पुलिसकर्मी वीरगति को प्राप्त हुए.
– चाईबासा हमला (2022): पूर्व विधायक गुरुचरण नायक पर हमला कर उनके दो अंगरक्षकों की हत्या कर दी गई, जो इस बात का प्रमाण था कि नक्सली अब भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश में थे.
रणनीति में बदलाव: आक्टोपस’ से ‘ब्लैक फॉरेस्ट’ तक:
– सरकारों ने जब महसूस किया कि परंपरागत युद्ध से माओवाद को खत्म नहीं किया जा सकता, तब इंटेलिजेंस-बेस्ड ऑपरेशंस की शुरुआत हुई. झारखंड पुलिस और सीआरपीएफ ने मिलकर कई निर्णायक अभियान चलाए.
– ऑपरेशन आक्टोपस: बूढ़ा पहाड़ और दुर्गम क्षेत्र नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को ध्वस्त किया गया.
– ऑपरेशन डबल बुल: लोहरदगा और लातेहार की सीमा से भारी मात्रा में हथियार बरामद और शीर्ष कमांडरों की गिरफ्तारी हुई.
– ऑपरेशन चक्रबंधा: गया-औरंगाबाद-पलामू सीमा नक्सलियों के सप्लाई नेटवर्क को काटा गया.
– ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट: झारखंड घने जंगलों के भीतर सर्च अभियान चलाकर सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को उनके गढ़ से बाहर खदेड़ा.
इन अभियानों की सबसे बड़ी सफलता बूढ़ा पहाड़ की आजादी:
इन अभियानों की सबसे बड़ी सफलता बूढ़ा पहाड़ को माओवादियों के कब्जे से मुक्त कराना रही. दशकों तक यह क्षेत्र नक्सलियों का अभेद्य दुर्ग माना जाता था, जहां सुरक्षा बल जाने से कतराते थे. आज वहां स्थायी सुरक्षा कैंप हैं और विकास की योजनाएं धरातल पर उतर रही हैं.
झारखंड गठन से अबतक नक्सली हमले में 841 आम लोगों की गई जान:
– 2000: 13
– 2001: 36
– 2002: 25
– 2003: 43
– 2004: 16
– 2005: 28
– 2006: 18
– 2007: 65
– 2008: 61
– 2009: 68
– 2010: 73
– 2011: 79
– 2012: 49
– 2013: 44
– 2014: 49
– 2015: 15
– 2016: 34
– 2017: 27
– 2018: 17
– 2019: 20
– 2020: 08
– 2021: 11
– 2022: 06
– 2023: 14
– 2024: 12
– 2025: 07
– 2026: (अबतक) 00
– कुल: 841
झारखंड गठन से अबतक नक्सली हमले में 841 आम लोगों की गई जान:
– 2000: 13
– 2001: 36
– 2002: 25
– 2003: 43
– 2004: 16
– 2005: 28
– 2006: 18
– 2007: 65
– 2008: 61
– 2009: 68
– 2010: 73
– 2011: 79
– 2012: 49
– 2013: 44
– 2014: 49
– 2015: 15
– 2016: 34
– 2017: 27
– 2018: 17
– 2019: 20
– 2020: 08
– 2021: 11
– 2022: 06
– 2023: 14
– 2024: 12
– 2025: 07
– 2026: (अबतक) 00
– कुल: 841
झारखंड गठन से अबतक नक्सली हमले में 556 जवान शहीद:
– 2000: 03
– 2001: 44
– 2002: 77
– 2003: 19
– 2004: 36
– 2005: 28
– 2006: 48
– 2007: 08
– 2008: 38
– 2009: 71
– 2010: 25
– 2011: 29
– 2012: 25
– 2013: 26
– 2014: 14
– 2015: 05
– 2016: 08
– 2017: 04
– 2018: 10
– 2019: 13
– 2020: 02
– 2021: 06
– 2022: 02
– 2023: 05
– 2024: 03
– 2025: 07
– 2026: (अबतक) 00
– कुल: 556
झारखंड में बचे सिर्फ 49 वांटेड नक्सली:
एक करोड़ के दो इनामी नक्सली:
– मिसिर बेसरा
– असीम मंडल
25 लाख के दो इनामी नक्सली:
– ब्रजेश गंझु
– अजय महतो
15 लाख के आठ इनामी नक्सली:
– मोछू उर्फ मेहनत
– मदन महतो
– संजय महतो
– रामप्रसाद मारडी
– नितेश यादव
– रवीन्द्र गंझु
– बेला सरकार
– सहदेव महतो
10 लाख के आठ इनामी नक्सली:
– आरिफ जी
– मनोहर गंझु
– सलूका कायम
– पुष्पा महतो
– गोदराय यादव
– अमृत होरो
– चंदन लोहरा
– रंजीत गंझू
पांच लाख के 17 इनामी नक्सली:
– अनिल तुरी
– सुखलाल बिरजिया
– समीर सोरेन
– समीर महतो
– सुलेमान हांसदा
– सचिन बेंग
– गुलशन सिंह मुंडा
– जयंती
– प्रभात मुंडा
– पंकज कोरबा
– बिरेन सिंह
– सागेन अंगेरिया
– मिता
– मीणा
– राज भुइयां
– रामदेव लोहरा
– मीणा
दो लाख के चार इनामी नक्सली:
– करण
– मालती मुर्मू
– सोनाराम उर्फ सुदेश
– बलराम लोहरा
एक लाख के छह इनामी नक्सली:
– इसराइल
– बासु पूर्ति
– बासमती जेराई
– सामएल बुध
– फुलमनी कोड़ा
– चोगो पूर्ति
