रांची: झारखंड की सत्ताधारी इंडिया गठबंधन में अब सब कुछ ठीक है का मुखौटा उतर चुका है, जिसे अब तक अंदरूनी कलह कहा जा रहा था, वह अब खुले विद्रोह में बदल चुका है. कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के बीच की तल्खी इस कदर बढ़ गई है कि कांग्रेस अब अपनी ही सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंक चुकी है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि राज्य सभा चुनाव के बाद सियासी फिजा बदलने वाली है.
अपनों पर ही अपनों का प्रहार: कांग्रेस के तीखे तेवर
मंगलवार को प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के. राजू के बयानों ने सरकार की चूलें हिला दी हैं. उन्होंने किसी विपक्षी नेता की तरह अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कई गंभीर आरोप लगाए. कहा कि माइनिंग माफिया और जिला प्रशासन की मिलीभगत के खिलाफ कांग्रेस अब उग्र आंदोलन करेगी. सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ठप है और 70 हजार शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, जिस पर सरकार मौन है. मुख्यमंत्री को सीधा संदेश दिया गया है कि सरकार एकतरफा नहीं चलेगी. समन्वय समिति और 20 सूत्री कमेटियों का गठन तत्काल हो. विष्णुगढ़ और धनबाद की हालिया घटनाओं ने आग में घी का काम किया है, जहां कांग्रेस ने कानून-व्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकार को कोसा है.
राज्यसभा चुनाव: दोस्ती और दुश्मनी का लिटमस टेस्ट
मई में होने वाले राज्यसभा की दो सीटों के चुनाव अब उस थर्मामीटरकी तरह देखे जा रहे हैं, जो गठबंधन का भविष्य तय करेंगे. गठबंधन के पास कुल 56 मत हैं. जेएमएम (34) अपना एक उम्मीदवार आसानी से जिता लेगी, लेकिन उसके बाद बचने वाले 7 वोट और कांग्रेस के 16 वोटों के बीच तालमेल ही दूसरे उम्मीदवार की जीत तय करेगा. यदि दूसरे उम्मीदवार को लेकर सियासी कलाबाजी हुई, तो झारखंड की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है.
असम से लेकर बिहार तक: रिश्तों में जमी बर्फ
बिहार में जेएमएम को एक भी सीट नहीं मिली और कांग्रेस ने बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए जेएमएम का पक्ष नहीं लिया. असम चुनाव में सीटों के बंटवारे पर बातचीत तक नहीं हुई. जेएमएम ने वहां 21 सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस को खुला चैलेंज दे दिया है. वही राज्य में हुए निकाय चुनावों में दोनों दल दोस्त नहीं बल्कि एक-दूसरे के विरोधी बनकर लड़े.
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