रांचीः पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार असम में होने वाला चुनावी शंखनाद केवल दिसपुर की सत्ता का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि इसकी गूंज करीब हजार किलोमीटर दूर झारखंड के गलियारों में भी सुनाई दे रही है. असम और झारखंड के बीच भाषाई और भौगोलिक दूरी भले ही अधिक हो, लेकिन दोनों राज्यों की राजनीतिक तासीर,विशेषकर जनजातीय समीकरण, घुसपैठ का मुद्दा और चाय बागानों से जुड़ा झारखंडी कनेक्शन, इस चुनाव को एक-दूसरे का पूरक बनाता है. असम की जीत-हार का मनोवैज्ञानिक असर न केवल झारखंड के आगामी चुनावों के एजेंडे को धार देगा. साथ ही यहां के क्षेत्रीय क्षत्रपों और राष्ट्रीय दलों के बीच शक्ति संतुलन को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा.
नैरेटिव की लड़ाई: एनआरसी और घुसपैठ
असम चुनाव में अवैध घुसपैठ और डेमोग्राफी हमेशा से बड़े मुद्दे रहे हैं. झारखंड में भाजपा इसी मॉडल को संथाल परगना के संदर्भ में भुनाने की कोशिश कर रही है. यदि असम में भाजपा अपने इस नैरेटिव के साथ सफल रहती है, तो झारखंड में रोट-बेटी-माटी का नारा और अधिक आक्रामक होगा. इसके विपरीत, विपक्षी गठबंधन इसे ध्रुवीकरण की राजनीति बताकर काउंटर-नैरेटिव सेट करने की कोशिश करेगा.
आदिवासी राजनीति और चाय बागान कनेक्शन
असम के चाय बागानों में काम करने वाले लाखों टी-ट्राइब्स मूल रूप से झारखंड के छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्र के प्रवासी हैं. असम में इन मतदाताओं का झुकाव जिस तरफ होगा, उसका सीधा संदेश झारखंड के उनके पैतृक गांवों और परिजनों तक पहुंचेगा. यह वोट बैंक झारखंड की कम से कम 10 से 15 विधानसभा सीटों पर प्रभाव डालने की क्षमता रखता है.
स्टार प्रचारकों का कद और नेतृत्व परीक्षण
वर्तमान में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी जैसे नेता असम में स्टार प्रचारक के रूप में सक्रिय हैं. असम में उनकी सभाओं की सफलता और पार्टी का प्रदर्शन झारखंड भाजपा के भीतर उनके नेतृत्व की स्वीकार्यता और संगठन की मजबूती का लिटमस टेस्ट साबित होगा.
गठबंधन की मजबूती पर असर
असम के नतीजे यह तय करेंगे कि झारखंड में झामुमो-कांग्रेस गठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर कितनी मजबूती मिलती है. यदि कांग्रेस असम में बेहतर प्रदर्शन करती है, तो झारखंड के गठबंधन में वह ज्यादा सीटों की दावेदारी करेगी. वहीं, यदि भाजपा वहां क्लीन स्वीप करती है, तो झारखंड में इंडिया गठबंधन के सामने रक्षात्मक रुख अपनाने की चुनौती होगी. असम का चुनाव परिणाम झारखंड के लिए केवल एक चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि एक पॉलिटिकल मैसेजिंग होगा. यह तय करेगा कि आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति विकास के मुद्दों पर केंद्रित रहेगी या फिर अस्मिता और ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमेगी.
