विज्ञान के युग में भी ‘देवास-भगतिन’ के चंगुल में समाज, विष्णुगढ़ की घटना ने सभी को झकझोरा

  हजारीबाग: एक तरफ दुनिया मंगल ग्रह पर जीवन तलाश रही है, तो दूसरी तरफ हमारे गांवों में आज भी देवास-भगतिन की...

 

हजारीबाग: एक तरफ दुनिया मंगल ग्रह पर जीवन तलाश रही है, तो दूसरी तरफ हमारे गांवों में आज भी देवास-भगतिन की कुप्रथा मासूमों की जान ले रही है. विष्णुगढ़ मासूम हत्याकांड ने यह स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू क्लेश, बीमारी या आर्थिक तंगी आने पर लोग अस्पताल जाने के बजाय तांत्रिकों और भगतिन के डेरों पर माथा टेकना ज्यादा बेहतर समझते हैं. इसी अंधविश्वास की भेंट चढ़ी एक मासूम और दागदार हुआ मां जैसा पवित्र रिश्ता.

जब खुद का घर था ‘अशांत’, तो दूसरों का दुख कैसे हरती ‘शांति’?

विष्णुगढ़ हत्याकांड की आरोपित भगतिन शांति देवी का अपना घर दुखों का केंद्र बना हुआ है. उसके पुत्र व पति की मौत हो चुकी है, बहू किसी अन्य के साथ भाग गई है और पोता मानसिक रूप से बीमार है. सवाल यह उठता है कि जो भगतिन अपनी शक्ति से अपने परिवार का दुख दूर नहीं कर सकी, उसके पास लोग अपनी समस्याओं का समाधान खोजने कैसे पहुंच जाते हैं?

बीमारी में डॉक्टर नहीं, भगतिन है पहली पसंद:

ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति आज भी जीवित है कि शारीरिक या मानसिक बीमारी को ऊपरी हवा या दोष मान लिया जाता है. विष्णुगढ़ मामले में भी हत्यारिन मां अपने बेटे के स्वास्थ्य और घरेलू क्लेश की समस्या लेकर भगतिन के पास गई थी. वैज्ञानिक सोच की कमी और जागरूकता के अभाव में लोग डॉक्टर की महंगी फीस से बचने या चमत्कार की उम्मीद में इन ढोंगियों के जाल में फंस जाते हैं, जिसका अंत बहुत भयावह होता.

सिर्फ कार्रवाई काफी नहीं, चलाने होंगे व्यापक अभियान:

विष्णुगढ़ की घटना महज एक क्राइम रिपोर्ट नहीं, बल्कि समाज की मानसिक बीमारी का लक्षण है. प्रशासन को अब फायर फाइटिंग मोड से निकलकर स्थायी समाधान पर काम करना होगा. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को गांवों में नुक्कड़ नाटकों और फिल्मों के जरिए यह दिखाना चाहिए कि कैसे तांत्रिक लोगों को ठगते हैं. झारखंड में अंधविश्वास से जुड़ी हिंसा के खिलाफ कड़े कानून हैं, लेकिन जागरूकता की कमी है. जब गांव के स्वास्थ्य उप-केंद्रों पर डॉक्टर और दवाएं आसानी से मिलेंगी, तभी लोग भगतिन के पास जाना छोड़ेंगे. प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को चमत्कार के पीछे के विज्ञान के बारे में पढ़ाया जाए, ताकि अगली पीढ़ी इस दलदल से मुक्त हो सके.

हर गांव में सक्रिय हैं देवास:

ग्रामीण इलाकों की कड़वी सच्चाई यह है कि लगभग हर गांव में देवास या भगताइन सक्रिय है. इन केंद्रों पर केवल इलाज नहीं, बल्कि अंधविश्वास का पूरा व्यापार चलता है. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को भूत का साया बताकर जंजीरों से बांधना, मारपीट करना आम बात है. देवास जाने वाले अधिकतर लोग घर बांधने या विरोधियों पर भूत छोड़ने जैसे अंधविश्वास के जाल में फंसते हैं.इससे गांवों में आपसी दुश्मनी और बढ़ती है. घरेलू कलह हो, संतान न होना हो या व्यापार में घाटा. इनके पास हर समस्या का समाधान बलि या टोने-टोटके के रूप में मौजूद होता है. इलाज के नाम पर ग्रामीणों से मोटी रकम, मुर्गा, बकरा और शराब की मांग करते हैं, जिससे परिवार कर्ज के दलदल में धंस जाता है.

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