HC ने कहा—पीड़ा में मरीज की प्रतिक्रिया पर बर्खास्तगी गलत, मृतक कर्मचारी के परिजनों को मिलेगा पूरा बकाया वेतन

​रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने श्रमिक अधिकारों के संरक्षण में बड़ा फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है...

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने श्रमिक अधिकारों के संरक्षण में बड़ा फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि अगर विभागीय जांच कानूनी रूप से सही भी पाई जाए तब भी लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण को यह जांचने का पूरा अधिकार है कि कर्मचारी को दी गई सजा उसके अपराध की गंभीरता के अनुपात में है या नहीं. झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रौशन की एकलपीठ ने प्रबंधन द्वारा 2008 के लेबर कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया.

Also Read: बिहार की सेवा में दो दशक: CM नीतीश कुमार ने भावुक संदेश के साथ राज्यसभा जाने की इच्छा जताई, कहा- नई सरकार का करेंगे मार्गदर्शन

क्या है मामला 

यह विवाद वर्ष 1983 का है. जिसमें एक कंपनी के कर्मचारी सी.के. सिंह का नियोक्ता के ही अस्पताल में ऑपरेशन हुआ था. ऑपरेशन के दौरान टांका अंदर छूट जाने के कारण उन्हें गंभीर संक्रमण और असहनीय दर्द हुआ. जब वे दोबारा उपचार के लिए अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने कथित रूप से इलाज से मना कर दिया.

दर्द से तड़पते हुए कर्मचारी ने विरोध जताया जिसे अभद्र व्यवहार मानकर प्रबंधन ने 18 जून 1984 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया. सुनवाई के दौरान अदालत ने बेहद मानवीय और तार्किक रुख अपनाते हुए कहा कि किसी भी मरीज का तीव्र दर्द में प्रतिक्रिया देना अस्वाभाविक नहीं है विशेषकर तब जब उसे उपचार देने से मना कर दिया गया हो. अगर यही मामला किसी वरिष्ठ अधिकारी का होता तो मेडिकल लापरवाही के लिए डॉक्टर के विरुद्ध कार्रवाई होती और मुआवजा मिलता. लेकिन इस मामले में यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक कर्मचारी को न केवल शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ी बल्कि अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ी.

Also Read: नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा पर सियासत गरम, झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी की नसीहत

कोर्ट का आदेश 

अदालत ने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 11A का हवाला देते हुए कहा कि लेबर कोर्ट केवल जांच की वैधता तक सीमित नहीं है. वह यह देख सकता है कि क्या सजा अत्यधिक है और क्या कर्मचारी का पिछला आचरण बेदाग रहा है.

इस मामले में कर्मचारी का 14 साल का सेवा रिकॉर्ड और उसकी बीमार स्थिति जिन्हें नजरअंदाज किया गया. कार्यवाही के दौरान कर्मचारी सी.के. सिंह का निधन हो चुका है इसलिए हाईकोर्ट ने मानवीय आधार पर आदेश दिया कि उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को अवार्ड की तिथि से मृत्यु या सेवानिवृत्ति तक का पूर्ण वेतन दिया जाए.

सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *