घाटे और घटती जमीन के बीच जूझ रहा एचईसी, 27 बस्तियों ने घेरा 1800 करोड़ की जमीन

रांची: रांची का प्रतिष्ठित औद्योगिक उपक्रम एचईसी आज गंभीर वित्तीय संकट और जमीन के लगातार सिमटते दायरे की दोहरी मार झेल रहा...

रांची: रांची का प्रतिष्ठित औद्योगिक उपक्रम एचईसी आज गंभीर वित्तीय संकट और जमीन के लगातार सिमटते दायरे की दोहरी मार झेल रहा है. कभी देश के औद्योगिक विकास का प्रतीक रहा एचईसी अब हजारों करोड़ के घाटे, बढ़ती देनदारियों और अतिक्रमण की समस्या से जूझ रहा है.

जमीन पर कब्जा: 27 बस्तियों में बसी अवैध आबादी

एचईसी की जमीन पर अतिक्रमण एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है. करीब 1800 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन पर 27 बस्तियां अवैध रूप से बस चुकी हैं. इन बस्तियों में हजारों लोग रह रहे हैं, जिससे न केवल एचईसी की संपत्ति पर दबाव बढ़ा है, बल्कि भविष्य की औद्योगिक योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं.

जमीन का सिमटता दायरा

स्थापना के समय लगभग 7200 एकड़ में फैले एचईसी का क्षेत्रफल अब घटकर लगभग 5500–5800 एकड़ के बीच रह गया है. वर्तमान में एचईसी के पास केवल 3500 एकड़ जमीन ही उपलब्ध बची है. बाकी जमीन विभिन्न परियोजनाओं, संस्थानों और सरकारी उपयोग में चली गई है.

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कहां गई एचईसी की जमीन?

एचईसी की जमीन का बड़ा हिस्सा समय-समय पर विभिन्न संस्थानों और परियोजनाओं को दिया गया. प्रमुख ब्योरा इस प्रकार है:

  • 2009 में राज्य सरकार को बेची गई जमीन: 2342.03 एकड़
  • सीआईएसएफ को आवंटित: 158 एकड़
  • लीज पर दी गई जमीन: 313 एकड़
  • कुल लीज (अन्य सहित): 473.342 एकड़

इस जमीन पर अब नया टाउनशिप विकसित हो रहा है. स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत 656 एकड़ में निर्माण कार्य जारी है, जिसमें एचईसी की और 500 एकड़ जमीन जुड़ने की संभावना है.

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शैक्षणिक और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को मिला लाभ

एचईसी की जमीन पर कई प्रतिष्ठित संस्थान और परियोजनाएं विकसित हुईं, जिनमें शामिल हैं:

  • IIM रांची – लगभग 90–100 एकड़
  • NUSRL (नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी) – 60–70 एकड़
  • CIPET – 40–50 एकड़
  • रेलवे, सड़क, बिजली परियोजनाएं – 200+ एकड़

इसके अलावा सरकारी कार्यालयों और सुरक्षा बलों के लिए भी जमीन आवंटित की गई.

शहर विकास की कीमत चुकाता एचईसी

रांची के विस्तार के साथ सड़कों, ड्रेनेज, ओवरब्रिज और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए भी एचईसी की जमीन का उपयोग हुआ. इससे शहर को तो फायदा मिला, लेकिन एचईसी का औद्योगिक दायरा लगातार सिकुड़ता गया.

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औद्योगिक भविष्य पर उठ रहे सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एचईसी के पास अपनी मूल जमीन सुरक्षित रहती, तो यहां बड़े पैमाने पर नए उद्योग, निवेश और रोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते थे. आज की स्थिति में एचईसी को पुनर्जीवित करने के लिए वित्तीय सुधार के साथ-साथ जमीन के संरक्षण और उपयोग की स्पष्ट नीति की जरूरत बताई जा रही है.

 

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