Ravi bharti
रांची: झारखंड बीजेपी के गलियारों में आजकल वो सन्नाटा है, जिसे राजनीति की भाषा में मंथन और आम भाषा में कन्फ्यूजन कहा जा रहा है. एक तरफ सत्ता की कुर्सी सात समंदर पार दिख रही है, तो दूसरी तरफ संगठन के अंदर तेवर और कलेवर को लेकर ऐसी जंग छिड़ी है कि कार्यकर्ताओं को समझ नहीं आ रहा कि वे पार्टी विथ अ डिफरेंस में हैं या पार्टी विथ अ डिस्टेंस (जनता से दूरी) में. संगठन के अंदर का सबसे बड़ा क्लाइमेक्स यह रहा कि झारखंड के दिग्गज ‘बाबू’ यानी बाबूलाल मरांडी की विदाई प्रदेश अध्यक्ष पद से हो गई.अब कमान राज्यसभा सांसद आदित्य साहू के हाथों में है. दिल्ली के चाणक्यों ने शायद यह सोचा कि बाबूलाल विपक्ष के नेता के तौर पर विधानसभा में दहाड़ेंगे, और साहू जी वोट बैंक का मैनेजमेंट संभालेंगे. लेकिन हकीकत यह है कि फिलहाल संगठन में तेवर कम और वेट एंड वॉच का मोड ज्यादा है.
प्रवक्ताओं की स्थिति: टीवी पर टाइगर, जमीन पर सायलेंट
बात अगर बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ताओं की करें, तो उनकी स्थिति उस छात्र जैसी हो गई है जिसे सिलेबस तो पता है, पर एग्जाम सेंटर का रास्ता भूल गया है. पहले बीजेपी प्रवक्ताओं के बयानों से रांची का पारा चढ़ जाता था, अब वे केवल प्रेस रिलीज और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के फॉरवर्ड्स तक सिमट कर रह गए हैं. हेमंत सरकार पर हमला करने के बजाय, प्रवक्ता अब आपस में ही यह चर्चा करते नजर आते हैं कि भैया, अगली लिस्ट में मेरा नाम रहेगा या नहीं. बीजेपी का वो आक्रामक कलेवर जिसे देखने की जनता आदी थी, अब सॉफ्ट हिंदुत्व और वेटिंग लिस्ट के बीच कहीं खो गया है.
कलेवर बदल गया या सिर्फ कवर?
क्या झारखंड बीजेपी का तेवर कम हो गया है. इस पर राजनीति के जानकार कहते हैं कि बीजेपी आजकल साइलेंट मोड पर है ताकि जनता को उसकी याद आए. लेकिन सच तो यह है कि 2024 के विधानसभा चुनाव में महज 21 सीटों पर सिमटने का दर्द अभी गया नहीं है. आदिवासी बेल्ट में सेंधमारी का जो सपना देखा गया था, वह फिलहाल ठंडे बस्ते में है. झारखंड बीजेपी के प्रवक्ता आजकल टीवी डिबेट में ऐसे जाते हैं जैसे बिना तैयारी के वाइवा देने गए हों.
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सरकार की कमियां गिनाने के बजाय, वे मोदी जी के मन की बात सुनाकर वापस आ जाते हैं. शायद उन्हें डर है कि ज्यादा तेवर दिखाए, तो कहीं साइडलाइन का ठप्पा न लग जाए. बहरहाल विपक्ष के तौर पर आक्रामकता की कमी और जमीन पर कमजोर पकड़ चर्चा का विषय है.
