Ranchi: झारखंड कांग्रेस की मौजूदा हालत उस सदाबहार बाराती की तरह हो गई है, जिसे दूल्हे की शादी में पनीर तो मिल रहा है, लेकिन अपनी पसंद का म्यूजिक बजाने की इजाजत नहीं है. राज्य में सत्ता का सुख भोग रही पार्टी के अंदरूनी गलियारों में इन दिनों ऑल इज वेल का बोर्ड तो लगा है, लेकिन पीछे से आ रही कुर्सी युद्ध की आवाजें जनता तक साफ पहुंच रही हैं.
वेटिंग लिस्ट वाली पार्टी
झारखंड कांग्रेस आजकल एक ऐसी ट्रेन बन गई है, जिसके डिब्बे तो बहुत हैं, लेकिन इंजन कभी दिल्ली के सिग्नल का इंतजार करता है, तो कभी रांची की गठबंधन की पटरियों पर धीमी गति से रेंगता है. पार्टी के अंदर कहासुनी इतनी आम है कि कार्यकर्ता अब प्रेस रिलीज से ज्यादा प्रवक्ताओं के चेहरे के उतार-चढ़ाव से खबर पढ़ लेते हैं.
गुटबाजी का दौर
कांग्रेस के अंदर फिलहाल “हम और हमारे दो” वाली स्थिति नहीं, बल्कि “हर नेता और उसका अपना गुट” वाली थ्योरी चल रही है. जो मंत्री बन गए, वे अपनी कुर्सी बचाने के लिए दिल्ली दरबार में नतमस्तक हैं. जो नहीं बन पाए, वे नारी शक्ति और ओबीसी आरक्षण के बहाने अपनी ही सरकार को आईना दिखाने में व्यस्त हैं. हाल ही में प्रदेश महासचिव ने जिस तरह नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर केंद्र पर तंज कसा, उससे लगा कि पार्टी जिंदा है. लेकिन जमीन पर स्थिति यह है कि जिला कमेटियों में आज भी कार्यकर्ता इस बात पर लड़ रहे हैं कि झंडा कौन पकड़ेगा.
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बड़े भाई की छाया में राजनीति
सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस की स्थिति पेइंग गेस्ट जैसी है. मुख्यमंत्री आवास से जो आदेश निकलता है, कांग्रेस उसे अपनी उपलब्धि बताकर ऐसे प्रचारित करती है जैसे पूरी योजना उन्हीं के दिमाग की उपज हो. झारखंड कांग्रेस के नेताओं का आधा समय रांची के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट पर दिल्ली जाने वाली फ्लाइट का इंतजार करने में बीतता है. प्रभारी बदलते हैं, नीतियां बदलती हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं की सुनवाई का समय नहीं बदलता. दिल्ली से जब तक कोई पर्ची नहीं आती, तब तक रांची में पत्ता भी नहीं हिलता, और जब पर्ची आती है, तो आधे नेता बीमार पड़ जाते हैं.
प्रवक्ताओं की मुश्किलें
पार्टी के प्रवक्ताओं की हालत उस वकील जैसी है, जिसे केस तो कमजोर मिला है, लेकिन दलीलें दमदार देनी हैं. टीवी डिबेट्स में वे कभी भ्रष्टाचार के आरोपों पर डिफेंस करते नजर आते हैं, तो कभी गठबंधन की मजबूरी को “मजबूती” बताने का हुनर दिखाते हैं. झारखंड कांग्रेस में फिलहाल दो ही तरह के नेता बचे हैं—एक वे जो मंत्री पद की शपथ लेने का सपना देख रहे हैं, और दूसरे वे जो नाराजगी को अपना करियर बना चुके हैं. जनता पूछ रही है कि हाथ विकास के लिए उठेगा या सिर्फ आपस में हाथ मिलाने के लिए.
