मनीष भारद्वाज

रांची: झारखंड की स्वास्थ्य सेवा अब केवल ‘बदहाल’ नहीं रही, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं की कब्रगाह बन चुकी है. 21वीं सदी के भारत में, जहां हम डिजिटल इंडिया और चांद पर पहुंचने का दम भरते हैं, वहीं झारखंड के गांवों से आने वाली तस्वीरें आदिम युग की याद दिलाती हैं. यहां के सरकारी अस्पतालों की चौखट पर ‘गरीब होना’ किसी अभिशाप से कम नहीं है. राज्य के स्वास्थ्य महकमे की नाकामी अब सिर्फ फाइलों में नहीं, बल्कि उन चीखों में सुनाई देती है जो एम्बुलेंस के इंतजार में दम तोड़ देती हैं.
झोले में बंद ‘भविष्य’
झारखंड के सुदूर इलाकों से हाल ही में आई तस्वीरें सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों के गाल पर करारा तमाचा हैं. जब एक लाचार पिता अपने नवजात बच्चे के शव को प्लास्टिक के झोले में डालकर बस या पैदल ले जाने को मजबूर होता है, तो वह केवल एक लाश नहीं होती, बल्कि राज्य के स्वास्थ्य दावों की अर्थी होती है. अस्पताल प्रबंधन का ‘मर्चुअरी वैन’ (शव वाहन) देने से इनकार करना और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार करना यह बताता है कि यहां इंसान की कीमत एक जानवर से भी कम आंक दी गई है.
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खाट पर प्रसव की मजबूरी
वहीं, दूसरी ओर राज्य के ‘सफेद हाथी’ बन चुके स्वास्थ्य केंद्रों की हकीकत यह है कि गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए खाट पर लादकर पथरीले रास्तों और उफनती नदियों को पार करना पड़ता है. ‘108’ एम्बुलेंस सेवा का नेटवर्क ग्रामीण इलाकों में एक छलावा साबित हुआ है. जब एक गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से तड़प रही होती है, तब उसे स्ट्रेचर के बजाय चारपाई (खाट) नसीब होती है और अक्सर अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में ‘जच्चा-बच्चा’ दोनों दम तोड़ देते हैं. यह आंकड़ा केवल एक डेटा नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा की गई संगठित विफलता को दर्शाता है.
आंकड़ों का काला सच
झारखंड के स्वास्थ्य ढांचे का गणित पूरी तरह बिगड़ा हुआ है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब 75% पद रिक्त हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति यह है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) केवल ‘रेफरल पर्ची’ काटने के अड्डे बन गए हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट में स्वास्थ्य मानकों पर झारखंड का निचले पायदान पर रहना कोई इत्तेफाक नहीं है. राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है, जिसके कारण अस्पतालों में पैरासिटामोल तक की कमी बनी रहती है. शिशु मृत्यु दर (IMR) को कम करने के तमाम सरकारी दावे उन झोलों और खाटों के नीचे दबकर दम तोड़ चुके हैं, जिन्हें ढोने के लिए यहां का गरीब मजबूर है.
रिम्स और जिला अस्पतालों की हकीकत
राज्य के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज ‘रिम्स’ (RIMS) की स्थिति किसी डरावने सपने जैसी है. यहां वार्डों के अंदर जगह नहीं है, इसलिए मरीज नालियों के बगल में, फर्श पर और स्ट्रेचर के अभाव में जमीन पर लेटे नजर आते हैं. जिला अस्पतालों में करोड़ों की लागत से वेंटिलेटर खरीदे गए, लेकिन उन्हें चलाने के लिए ‘टेक्नीशियन’ भर्ती करना सरकार भूल गई. नतीजा यह है कि धूल फांकती मशीनें और जंग खाते उपकरण आज झारखंड की पहचान बन गए हैं. निजी अस्पतालों के साथ सांठगांठ का आलम यह है कि छोटी सी बीमारी में भी गरीब को प्राइवेट क्लीनिक का रास्ता दिखा दिया जाता है, जहाँ उसकी जमीन और गहने गिरवी रख दिए जाते हैं.

