कल्पना सोरेन का असम के नाम भावुक पत्र, चाय बागानों के पसीने को अब तक नहीं मिला पहचान का हक

    रांचीः झारखंड की कद्दावर नेत्री और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन ने असम विधानसभा चुनाव के बीच एक बेहद संवेदनशील पत्र...

 

 

रांचीः झारखंड की कद्दावर नेत्री और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन ने असम विधानसभा चुनाव के बीच एक बेहद संवेदनशील पत्र जारी कर असम के आदिवासी समाज की नब्ज टटोलने की कोशिश की है. उन्होंने असम के चाय बागानों में काम करने वाले लाखों आदिवासियों के दर्द को स्वर देते हुए इसे पीढ़ियों से चला आ रहा गहरा अन्याय करार दिया है. राजनीतिक चश्मे से परे, एक स्त्री और संवेदनशील नागरिक के नाते लिखे गए इस पत्र में कल्पना सोरेन ने असम के आदिवासियों को अब तक अनुसूचित जनजाति का दर्जा न मिलने पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है.

सिर्फ मेहनत नहीं, यह अन्याय की कहानी है

कल्पना सोरेन ने अपने पत्र में उन ऐतिहासिक जख्मों को कुरेदा है, जब पीढ़ियों पहले आदिवासियों को उनके मूल घरों से दूर असम की धरती पर लाया गया था. उन्होंने लिख है कि असम के आदिवासी समाज ने बिना किसी शर्त के इस धरती को अपना सब कुछ दे दिया. अपना श्रम, अपना जीवन और अपनी आने वाली पीढ़ियां. लेकिन आज एक सीधा सवाल खड़ा होता है,क्या इस समाज को उसका हक मिला.

संवैधानिक पहचान के लिए तड़प रहा समाज 

सबसे अहम पहलू वह प्रशासनिक विफलता है, जिसकी ओर कल्पना सोरेन ने इशारा किया है. उन्होंने जोर देकर कहा कि असम का आदिवासी समाज आज भी अपने मूल संवैधानिक अधिकार से वंचित है. उनके अनुसार, यह केवल एक कागजी निर्णय नहीं है, बल्कि एक ऐसी पीड़ा है जो उन परिवारों के सपनों को पहचान के अभाव में दम तोड़ने पर मजबूर कर देती है.

असम की जनता से न्याय की अपील

कल्पना सोरेन ने अपने पत्र के अंत में इसे राजनीति से ऊपर उठाकर सम्मान और न्याय का प्रश्न बताया है. उन्होंने असमवासियों से अपील की है कि अब समय आ गया है जब लोकतंत्र को इस पुराने और न्यायपूर्ण प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए. कल्पना सोरेन ने खुद को एक आदिवासी समाज के दर्द को समझने वाली स्त्री के रूप में पेश किया.

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आपकी आवाज़ अब और दबाई नहीं जा सकती

असम की जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मैं असम की जनता से कहना चाहती हूं कि आपकी आवाज़ महत्वपूर्ण है, आपका अधिकार वैध है.आपका सम्मान अनिवार्य है. यह राजनीति का विषय नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और न्याय का प्रश्न है.

लोकतंत्र से मांगा न्यायपूर्ण उत्तर

अपने संदेश के अंत में उन्होंने सीधे तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और नीति-निर्धारकों को चुनौती दी है. उन्होंने जोर देकर कहा कि असम का आदिवासी समाज अब और इंतजार नहीं करेगाय, यह सही समय है जब लोकतंत्र को आदिवासियों के हक के लिए उठ रहे इन सवालों का एक स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायपूर्ण उत्तर देना चाहिए.

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