रांची: झारखंड में सड़क, बिजली और सिंचाई जैसी बुनियादी सुविधाओं को धरातल पर उतारने की कोशिशें एक बार फिर वन विभाग की लाल झंडी के कारण सुस्त पड़ गई हैं. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य सरकार के लगभग 40 से अधिक छोटे-बड़े प्रोजेक्ट्स वर्तमान में वन भूमि हस्तांतरण और पर्यावरणीय स्वीकृति के अभाव में अधर में लटके हैं. इनमें से कई योजनाएं ऐसी हैं जिनकी आधारशिला वर्षों पहले रखी गई थी, लेकिन फॉरेस्ट क्लीयरेंस न मिलने के कारण उनकी लागत अब दोगुनी हो चुकी है. मुख्यमंत्री की लगातार समीक्षा के बावजूद प्रशासनिक तालमेल की कमी विकास की रफ्तार पर भारी पड़ रही है. झारखंड में लंबित प्रोजेक्ट्स में 70 प्रतिशत बिजली और सड़क क्षेत्र से जुड़े हैं. विभाग का तर्क है कि नेट प्रेजेंट वैल्यू और कैंपा फंड के भुगतान में देरी के कारण एनओसी अटकी हुई है.
वन विभाग की एनओसी के कारण अटके हैं ये 10 प्रमुख प्रोजेक्ट्स
• पतरातू-लातेहार 400 केवी ट्रांसमिशन लाइन: ऊर्जा क्षेत्र के लिए जीवन रेखा मानी जाने वाली यह लाइन 126.9 हेक्टेयर वन भूमि के कारण लंबित है. मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अभी भी क्षेत्रीय कार्यालय स्तर पर इसकी फाइल अतिरिक्त सूचना के लिए रुकी हुई है.
• धालभूमगढ़ एयरपोर्ट (जमशेदपुर): यह प्रोजेक्ट हाथियों के कॉरिडोर में आने के कारण फंसा हुआ है. वन विभाग ने सुरक्षा कारणों से वर्तमान स्थल पर एनओसी देने से मना कर दिया है. वैकल्पिक भूमि की तलाश जारी है.
• कोलेबिरा-सिमडेगा 132 केवी ट्रांसमिशन लाइन: यह परियोजना 22.6 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण के इंतजार में है. यह फाइल वर्तमान में मार्च 2026 से ही क्षेत्रीय वन कार्यालय में लंबित है.
• पलामू टाइगर रिजर्व टाइगर सफारी (पुतुलगढ़): इको-टूरिज्म के लिए महत्वपूर्ण इस प्रोजेक्ट का टेंडर मार्च 2026 में तकनीकी कारणों और पर्यावरणीय आपत्तियों के बाद रद्द करना पड़ा. अब नए सिरे से स्वीकृति की प्रक्रिया शुरू की गई है.
• सोनुआ-पनसुआ-लोधाई-गुदरी रोड (41.56 किलोमीटर): पश्चिमी सिंहभूम के घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को जोड़ने वाली यह महत्वपूर्ण सड़क वन भूमि के कारण वर्षों से अधूरी है. विभाग ने पेड़ों की कटाई के लिए अब तक अंतिम मंजूरी नहीं दी है.
• हजारीबाग (सिंदूर) – ईसीआर रेलवे ट्रांसमिशन लाइन: रेलवे के विद्युतीकरण के लिए जरूरी इस 10.1 हेक्टेयर के प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी तो मिली है, लेकिन अंतिम एनओसी का काम मार्च 2026 में भी प्रक्रियाधीन है.
• जीएसएस जैनामोड़ (बोकारो) – गोविंदपुर ट्रांसमिशन लिंक: जेयूएसएनएल की यह योजना 34.7 हेक्टेयर वन भूमि के पेंच में फंसी है. 2021 से चल रही यह फाइल अब भी विभागीय चक्कर काट रही है.
• पद्मा-नाचनवे 33 केवी विद्युतीकरण (हजारीबाग): दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत यह प्रोजेक्ट महज 7.6 हेक्टेयर वन भूमि के कारण अंतिम मंजूरी नहीं पा सका है.
• कनहर बराज नहर प्रणाली (गढ़वा): उत्तर प्रदेश से सटे इस क्षेत्र में नहरों के निर्माण के लिए सैकड़ों एकड़ वन भूमि की एनओसी लंबित है. स्थानीय वन प्रमंडल ने नए सिरे से सीमांकन की मांग की है.
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• पारादीप-नुमालीगढ़ क्रूड ऑयल पाइपलाइन (झारखंड हिस्सा): राज्य से गुजरने वाली इस पाइपलाइन के लिए 6.2 हेक्टेयर भूमि पर एनओसी का मामला नवंबर 2025 से सैद्धांतिक स्तर पर ही अटका है.
