रांची: झारखंड में जमीन का झगड़ा अब सिर्फ दो पक्षों की लड़ाई नहीं, बल्कि सरकारी फाइलों और धूल फांकते नक्शों की एक त्रासदी बन चुका है. बिहार के गुलजारबाग प्रेस से तीन ट्रकों में भरकर लाए गए 82,129 नक्शे आज झारखंड के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे हैं. करोड़ों खर्च करने के बाद भी स्थिति यह है कि राज्य में जमीन विवाद सुलझने के बजाय और अधिक पेचीदा होते जा रहे हैं. झारखंड सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में है. करोड़ों के नक्शे बंद कमरों में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, जबकि बाहर की दुनिया में जमीन के एक-एक इंच के लिए खून बह रहा है.
तीन ट्रकों का बोझ और सिस्टम की सुस्ती
झारखंड सरकार ने बिहार के साथ लंबित परिसंपत्तियों के बंटवारे और राज्य के हर गांव की सटीक मैपिंग के लिए 52 करोड़ रुपये खर्च कर इन नक्शों को मंगाया था. योजना यह थी कि इन नक्शों का डिजिटाइजेशन किया जाएगा.25 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस स्थापित होगी. एक प्रति रैयत के पास होगी और दूसरी प्रेस में सुरक्षित रहेगी. लेकिन हकीकत यह है कि न तो प्रिंटिंग प्रेस धरातल पर उतरी और न ही इन नक्शों का डिजिटाइजेशन हुआ. लेकिन यह बेशकीमती दस्तावेज आज जस के तस पड़े हुए हैं.
तकनीकी बाधा बनी हुई कैथी लिपि
इस पूरी योजना के फेल होने के पीछे एक बड़ी तकनीकी बाधा कैथी लिपि है. पुराने नक्शों और दस्तावेजों में कैथी भाषा का प्रयोग किया गया है. झारखंड में कैथी लिपि को पढ़ने वाले अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं.संथाल परगना जैसे इलाकों में तो कैथी जानने वाला अब कोई बचा ही नहीं है. बिना भाषा समझे शुद्धिकरण असंभव है, और बिना शुद्धिकरण के विवादों का अंत नहीं.
किसे मिला फायदा, किसे हुआ नुकसान
- बिल्डर लॉबी की चांदी: मैपिंग के अभाव में सीमांकन स्पष्ट नहीं है, जिसका सीधा फायदा भू-माफिया और बिल्डरों को मिल रहा है. अवैध कब्जे का जाल फैलता जा रहा है.
- रैयतों की तबाही: रैयत अपने मालिकाना हक के लिए अदालतों के चक्कर काट रहे हैं.
- अदालतों पर बोझ: जानकारों का मानना है कि यदि इन नक्शों का शुद्धिकरण हो जाए, तो झारखंड के 80 से 90 फीसदी जमीन विवाद चंद दिनों में हल हो सकते हैं.
