Ranchi: झारखंड की प्रशासनिक गलियारों में शो-कॉज अब एक ऐसा शब्द बन चुका है, जिससे अफसरों के माथे पर पसीना नहीं आता, बल्कि यह महज एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह गया है. सरकार की मंशा भ्रष्टाचार और सुस्ती पर वार करने की होती है, लेकिन नोटिस का जवाब आने के बाद शुरू होने वाली “चुप्पी” पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान खड़ा करती है.
जनता की शिकायतों पर नोटिस तो जारी होते हैं, लेकिन अंजाम तक पहुंचने वाली कार्रवाई के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. पिछले दो वर्षों के भीतर विभिन्न विभागों द्वारा 500 से अधिक राजपत्रित अधिकारियों को शो-कॉज जारी किया गया है. लेकिन कार्रवाई के अंजाम तक पहुंचने से पहले ही फाइलें ठंडी पड़ गईं.
किस विभाग के कितने अफसरों को शो-कॉज
• राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग: जमीन विवाद और म्यूटेशन में देरी को लेकर लगभग 150 से अधिक अंचल अधिकारियों और राजस्व उप-निरीक्षकों को नोटिस थमाया गया.
• स्वास्थ्य विभाग: ड्यूटी से गायब रहने और लापरवाही के मामले में 85 से ज्यादा चिकित्सकों और स्वास्थ्य पदाधिकारियों से जवाब मांगा गया.
• ग्रामीण विकास विभाग: मनरेगा और अन्य योजनाओं में वित्तीय अनियमितता को लेकर 110 से अधिक बीडीओ और इंजीनियरों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया.
• शिक्षा विभाग: 60 से अधिक अफसरों के खिलाफ शो-कॉज किया गया.
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कितने विभाग में कितने अफसरों के खिलाफ हुई कार्रवाई
• राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग: सिर्फ 10 फीसदी के खिलाफ कार्रवाई हुई.
• ग्रामीण विकास विभाग: सिर्फ 15 फीसदी के खिलाफ कार्रवाई हुई.
• स्वास्थ्य विभाग: सिर्फ 5 फीसदी के खिलाफ कार्रवाई हुई.
• शिक्षा विभाग: सिर्फ 12 फीसदी के खिलाफ कार्रवाई हुई.
कार्यशैली का पेंच
• ठंडे बस्ते में जवाब: जब अधिकारी अपना जवाब सौंपते हैं, तो उसकी समीक्षा करने में महीनों लग जाते हैं. अक्सर रसूखदार अधिकारी अपने राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल कर मामले को दबवा देते हैं.
• सस्पेंशन और बहाली का खेल: कई मामलों में अधिकारियों को निलंबित तो किया जाता है, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उन्हें फिर से महत्वपूर्ण पदों पर लूप लाइन से निकालकर तैनात कर दिया जाता है.
क्या होता है नुकसान
• योजनाओं की सुस्ती: शो-कॉज की प्रक्रिया में उलझे अधिकारी काम करने के बजाय फाइल मैनेजमेंट में लग जाते हैं, जिससे विकास योजनाएं 20 से 30 फीसदी तक पिछड़ जाती हैं.
• जनता का अविश्वास: जब किसी दागी अफसर पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठने लगता है.
• वित्तीय क्षति: जांच की लंबी प्रक्रिया और निलंबन के दौरान दिए जाने वाले जीवन निर्वाह भत्ते के रूप में सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है.
