Ravi Bharti
रांची: धनबाद के रेल इतिहास में 6 अप्रैल की रात केवल एक नई ट्रेन की शुरुआत के लिए नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भीतर धधकती गुटबाजी के ज्वालामुखी के फटने के लिए याद की जाएगी. पटरी पर धनबाद-मुंबई एक्सप्रेस दौड़ी, लेकिन प्लेटफार्म नंबर 8 पर मचे सियासी दंगल ने विकास के शोर को फीका कर दिया. जिस उत्सव को कोयलांचल की एकता का प्रतीक होना था, वह वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बन गया. अपनों को ही अपमानित कर किनारे करने के इस खेल ने धनबाद से लेकर दिल्ली तक की सियासत में भूचाल ला दिया है. ट्रेन तो मुंबई पहुंच जाएगी, लेकिन धनबाद भाजपा के भीतर की जो दरारें इस उद्घाटन ने दिखाई हैं, उन्हें भरने में कितनी इंजन की शक्ति लगेगी, यह आने वाला वक्त बताएगा.
आओ कहकर रास्ता काटा
उद्घाटन से तीन दिन पहले धनबाद के प्रथम नागरिक यानि मेयर संजीव सिंह और झरिया विधायक रागिनी सिंह को न्योता भेजा गया. बैनरों पर उनके नाम चमक रहे थे. लेकिन खेल तब पलटा जब उद्घाटन के मात्र 3 घंटे पहले उनके आमंत्रण कैंसिल कर दिए गए. आनन-फानन में प्लेटफार्म से लेकर स्टेशन परिसर तक लगे बैनर बदल दिए गए और मेयर व विधायक के नाम गायब कर दिए गए.
वर्चस्व की जंग: सांसद बनाम मेयर
पूरे घटनाक्रम के केंद्र में धनबाद सांसद ढुलू महतो रहे. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह सांसद द्वारा अपनी ताकत दिखाने और संगठन के भीतर अपने विरोधियों को साइज करने का तरीका था. सांसद ने अकेले हरी झंडी दिखाई और यहां तक कि ट्रेन के इंजन पर सवार होकर अपनी धमक का संदेश भी पहुंचाया.
विधायक राज सिन्हा की दूरी
भाजपा की अंतर्कलह तब और स्पष्ट हुई जब धनबाद के विधायक राज सिन्हा इस ऐतिहासिक मौके से नदारद रहे. सांसद और विधायक के बीच के तल्ख रिश्तों की गूंज प्लेटफार्म पर खाली पड़ी कुर्सियों में सुनाई दे रही थी.
भाजपा की आंतरिक कलह
यह घटना महज एक प्रोटोकॉल की चूक नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर कब्जे की लड़ाई है. एक तरफ सांसद महतो का बढ़ता प्रभाव है, तो दूसरी तरफ पुराने क्षत्रपों को हाशिए पर धकेलने की रणनीति. यह विवाद ऐसे समय हुआ है जब बंगाल सीमा से सटे धनबाद की राजनीति का असर पड़ोसी राज्य पर भी पड़ता है. विपक्ष ने इसे भाजपा का अहंकार करार देकर चुनावी मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है.
रेलवे की सफाई और किरकिरी
विवाद इतना बढ़ा कि रेल मंत्रालय को दखल देना पड़ा. धनबाद रेल मंडल के अधिकारियों को आनन-फानन में मेयर और विधायक के घर जाकर सफाई देनी पड़ी, जिससे रेलवे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए. बहरहाल यह उद्घाटन समारोह विकास की पटरी से उतरकर पूरी तरह राजनीतिक अहंकार की भेंट चढ़ गया. जनता को ट्रेन तो मिली, लेकिन कोयलांचल को एक ऐसा राजनीतिक जख्म भी मिला जो आगे किसी बड़े धमाके का कारण बन सकता है.
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