रांची : झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (JAT) की स्थापना की मांग वाली PIL पर हाईकोर्ट में सुनवाई, राज्य में लगभग 800 मामले लंबित

Ranchi: राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (State Administrative Tribunal) की स्थापना की मांग को लेकर दायर प्रदीप कुमार की जनहित याचिका पर झारखंड हाई...

Ranchi: राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (State Administrative Tribunal) की स्थापना की मांग को लेकर दायर प्रदीप कुमार की जनहित याचिका पर झारखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम एस सोनक एवं न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान प्रार्थी के अधिवक्ता मंजूश्री पात्रा ने अदालत को यह जानकारी दी कि झारखंड अलग राज्य बनने के बाद राज्य में प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना अब तक नहीं की गई है. राज्य की स्थापना के 26 वर्ष के बाद भी राज्य के पदाधिकारी अपनी सेवा से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए पटना स्थित न्यायाधिकरण पर निर्भर हैं. उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि राज्य में पदाधिकारियों के सेवा से जुड़े लगभग 800 से भी अधिक केस दायर किए जा चुके हैं.

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केंद्र सरकार से मिल चुकी है सहमति

बीते दिनों मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ में ही यह आश्वासन दिया गया था कि प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना की जाएगी. 15 नवंबर 2025 को कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्य में झारखंड प्रशासनिक न्यायाधिकरण (JAT) की स्थापना की सहमति भी दे दी है. लेकिन इसके बावजूद अब तक इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. अदालत में इस मामले में राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए कहा है. साथ ही इसके स्थापना से संबंधित स्टेटस रिपोर्ट भी दाखिल करने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल मुकर्रर की गई है.

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क्या होता है राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण?

बता दें कि राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण संविधान के अनुच्छेद 323 ए के तहत स्थापित एक अर्ध न्यायिक निकाय है, जो राज्य सरकार के कर्मचारियों की भर्ती और सेवा शर्तों (वेतन, पदोन्नति, स्थानांतरण) से संबंधित विवादों को सुलझाता है. यह प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम 1985 के तहत गठित पारंपरिक अदालत के बोझ को कम करने और त्वरित न्याय प्रदान करने के लिए एक विशेष गठित मंच है. इसका उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों की सेवा संबंधित शिकायतों के तुरंत एवं कम खर्चों में समस्याओं का निपटारा करना है. यह राज्य सरकार के अधीन कार्यरत सिविल सेवाओं के सदस्यों से जुड़े मामलों को सुनता है. अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति एवं राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है. यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर काम करता है और इसे उच्च न्यायालय के समान शक्तियां प्रदत है.

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