Ranchi : कहते हैं 13 तारीख अशुभ होती है, लेकिन झारखंड के सरकारी कारिंदों के लिए यह तारीख अशुभ से ज्यादा अजीब साबित हुई. अप्रैल की चिलचिलाती धूप में जब प्रोजेक्ट भवन और नेपाल हाउस के गलियारों में सैलरी की ठंडी फुहार आनी चाहिए थी, वहां ट्रेजरी घोटाले की ऐसी लू चली कि कर्मचारियों के बटुए सूख गए. 13 अप्रैल बीत गया, पर अकाउंट में टिंग की आवाज नहीं आई. बदले में हाथ में थमा दिया गया एक लंबा-चौड़ा फॉर्म. साहब, वेतन चाहिए तो पहले ये बताओ कि धरती पर कब आए थे और दफ्तर में पहली बार कदम कब रखा था.
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खता किसी और ने की और सजा कोई और भुगत रहा
प्रोजेक्ट भवन में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर है कि खता किसी और ने की और सजा कोई और भुगत रहा है. एक बाबू दूसरे से पूछ रहे थे, महोदय, डेट ऑफ जॉइनिंग तो याद है, पर इस खाली जेब के साथ डेट ऑफ सर्वाइवल क्या लिखूं. ट्रेजरी घोटाले ने सरकार की ऐसी चूलें हिलाई हैं कि अब हर कर्मी को शक की निगाह से देखा जा रहा है. कर्मियों से जन्म तिथि से लेकर प्रथम नियुक्ति तक का विवरण ऐसे मांगा जा रहा है, जैसे वेतन नहीं, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति होने वाली हो.
नेपाल हाउस में बायोडाटा का कोहराम
नेपाल हाउस का मंजर तो और भी निराला था. फाइलें जो कभी रेंगती थीं, अब वे फॉर्म भरने की रफ्तार से शरमा रही हैं. दफ्तरों में वेतन न मिलने की व्याकुलता अब व्यंग्य में बदल चुकी है. चर्चा है कि सरकार को शायद भरोसा नहीं रहा कि जो कुर्सी पर बैठा है, वह वही है जिसकी नियुक्ति हुई थी. इसीलिए 13 अप्रैल को वेतन दिवस के बजाय विवरण दिवस के रूप में मनाया गया.
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कानों में सुनाई पड़ी कुछ तीखी कानाफूसी
एक कर्मचारी ने चुटकी ली, ट्रेजरी डिजिटल हुई तो घोटाला हो गया, अब हम मैनुअल फॉर्म भरकर अपनी ईमानदारी का सर्टिफिकेट दे रहे हैं. चर्चा यह भी है कि बड़े साहबों की चिंता तो फाइलों में दबी है, लेकिन छोटे बाबुओं की चिंता घर के राशन कार्ड और बिजली बिल के बीच झूल रही है. गलियारों में लोग कह रहे हैं कि अब अगला फॉर्म शायद यह आएगा कि पिछली सैलरी कहां खर्च की थी, उसका वाउचर भी जमा करें.
