Shruti Singh

News Desk : मध्य पूर्व में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष अब दुनिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक घटनाओं में शामिल हो गया है. यह टकराव अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे लगभग चार दशक पुरानी राजनीतिक दुश्मनी, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय ताकत की लड़ाई छिपी हुई है.

दुश्मनी की शुरुआत 1979 की ईरानी क्रांति से
इजराइल और ईरान हमेशा से दुश्मन नहीं थे. 1948 से लेकर 1979 तक दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध थे और ईरान उन मुस्लिम देशों में शामिल था जो इजराइल के साथ व्यापार और कूटनीतिक रिश्ते रखते थे. लेकिन 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई. नई सरकार ने अमेरिका और इजराइल दोनों को अपना दुश्मन घोषित कर दिया. इसके बाद ईरान ने मध्य पूर्व में कई ऐसे संगठनों का समर्थन करना शुरू किया जो इजराइल के विरोध में थे. इनमें लेबनान का हिज़्बुल्लाह और गाजा का हमास जैसे समूह शामिल हैं. दूसरी ओर इजराइल को डर था कि ईरान अगर परमाणु हथियार बना लेता है तो उसके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन सकता है. यही कारण है कि पिछले दो दशकों से दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया.

परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा कारण
ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस संघर्ष का सबसे बड़ा मुद्दा माना जाता है. 2015 में अमेरिका और कई देशों के साथ ईरान ने एक समझौता किया था जिसे जेसीपीओए (JCPOA) कहा जाता है. इस समझौते के तहत ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना था और बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए थे. लेकिन 2018 में अमेरिका इस समझौते से बाहर निकल गया. इसके बाद ईरान ने फिर से यूरेनियम संवर्धन बढ़ाना शुरू किया. इजराइल का आरोप है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है. इसी डर के कारण इजराइल कई बार ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले करता रहा है.

2025 से शुरू हुआ खुला सैन्य टकराव
हाल के वर्षों में यह टकराव और ज्यादा खुलकर सामने आया. जून 2025 में इजराइल ने ईरान के कई सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इस दौरान कई शीर्ष सैन्य अधिकारी और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए. इसके जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन से इजराइल पर हमला किया. इसके बाद फरवरी 2026 में हालात और ज्यादा बिगड़ गए जब इजराइल और अमेरिका ने मिलकर ईरान के कई शहरों और सैन्य ठिकानों पर बड़े हमले किए. ईरान ने भी जवाब में इजराइल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए.

अमेरिका क्यों हुआ इस युद्ध में शामिल
अमेरिका लंबे समय से इजराइल का सबसे बड़ा सहयोगी रहा है. अमेरिका का मानना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय गतिविधियां मध्य पूर्व की सुरक्षा के लिए खतरा हैं. इसी वजह से अमेरिका ने इजराइल का साथ देते हुए ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. इसके अलावा मध्य पूर्व में अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने भी हैं. जब ईरान समर्थित समूहों ने इन ठिकानों पर हमले किए तो अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल हो गया. इससे यह संघर्ष केवल दो देशों का नहीं बल्कि बड़े क्षेत्रीय संकट का रूप ले चुका है.
दुनिया पर क्या पड़ सकता है असर
इस संघर्ष का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है. ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ा दिया है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है. अगर यहां आपूर्ति बाधित होती है तो तेल की कीमतें और वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो इसमें और देश भी शामिल हो सकते हैं और इसका असर पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. इसलिए फिलहाल दुनिया की नजरें मध्य पूर्व की इस जंग पर टिकी हुई हैं.

