Giridih: गिरिडीह शहर में रामनवमी को लेकर उत्साह चरम पर है. और इसी के साथ महावीरी पताका की मांग भी तेजी से बढ़ी है. धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक यह पताका न केवल श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक समरसता की मिसाल भी पेश कर रहा है. गिरिडीह के भंडारीडीह निवासी मो. इम्तियाज का परिवार पिछली तीन पीढ़ियों से महावीरी पताका बनाने का कार्य कर रहा है. मो. इम्तियाज बताते हैं कि वे पिछले लगभग 40 वर्षों से इस काम से जुड़े हुए हैं. उन्होंने यह हुनर अपने पिता से सीखा, जिन्होंने उन्हें महज 14 साल की उम्र में पताका सिलना सिखाया था. परिवार की यह परंपरा आज भी पूरी निष्ठा और लगन के साथ आगे बढ़ रही है. शहर के बड़ा चौक पर इनका महावीर झंडा बनाने की दुकान है.

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केवल व्यवसाय नहीं, एक सामाजिक जिम्मेदारी : मो. इम्तियाज
मो. इम्तियाज का कहना है कि उनके लिए यह केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है. वे बताते हैं कि रामनवमी के मौके पर हर साल बड़ी संख्या में लोग उनके यहां से पताका बनवाते हैं. खास बात यह है कि अलग-अलग आकार और डिजाइन के पताके तैयार किए जाते हैं, जिनकी कीमत 10 रुपए से लेकर 500 रुपए तक होती है, जबकि विशेष ऑर्डर पर 15 हजार से 20 हजार तक के आकर्षक और बड़े पताके भी बनाए जाते हैं.
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महावीरी पताका की बिक्री जोरों पर
बाजारों में इन दिनों महावीरी पताका की बिक्री जोरों पर है. श्रद्धालु इन्हें खरीदकर अपने घरों, मंदिरों और पूजा स्थलों पर लगाते हैं. शहर के विभिन्न हिस्सों में दुकानें सजी हुई हैं और हर ओर भगवा रंग की छटा दिखाई दे रही है. जिले भर में 27 मार्च को मनाई जाने वाली रामनवमी को लेकर मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर तैयारियां अंतिम चरण में हैं. टॉवर चौक स्थित हनुमान मंदिर, बरगंडा का संकट मोचन मंदिर, अरगाघाट का बड़ा बजरंगबली मंदिर और बारमसिया पहाड़ी स्थान हनुमान मंदिर में विशेष सजावट की जा रही है. यहां श्रद्धालु महावीरी पताका के साथ ध्वजारोहण कर पूजा-अर्चना करेंगे. इस तरह मो. इम्तियाज का परिवार न केवल एक परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि गिरिडीह में भाईचारे, सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सौहार्द का भी मजबूत संदेश दे रहा.
