Ranchi: झारखंड में बालू को लेकर सियासत जारी है. कांग्रेस अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी है, वहीं बीजेपी भी इस मुद्दे पर हमलावर है.
संकट से ठप विकास कार्य
झारखंड में बालू की किल्लत अब सिर्फ आम आदमी के घर बनाने के सपनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने राज्य की विकास रफ्तार को भी प्रभावित कर दिया है.
नीलामी के बावजूद नहीं सुधरी स्थिति
सरकार द्वारा 444 चिह्नित बालू घाटों में से 298 की नीलामी प्रक्रिया पूरी कर ली गई है, लेकिन धरातल पर बालू की उपलब्धता और पर्यावरण मंजूरी की पेचीदगियों ने संकट को और गहरा कर दिया है.
हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट प्रभावित
राज्य के हजारों करोड़ के सरकारी प्रोजेक्ट या तो रुक गए हैं या उनकी गति बेहद धीमी हो गई है. इससे राजस्व की हानि हो रही है और लाखों परिवारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है.
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बालू की खपत और मांग का गणित
• दैनिक खपत: झारखंड में प्रतिदिन लगभग 1.5 लाख से 2 लाख घन फीट (सीएफटी) बालू की खपत होती है. जनवरी से जून के पीक सीजन में यह मांग और बढ़ जाती है.
• आपूर्ति का अंतर: वैध घाटों से उठाव कम होने के कारण मांग और आपूर्ति के बीच करीब 60 फीसदी का अंतर बना हुआ है, जिसे अवैध खनन के जरिए ऊंचे दामों पर पूरा किया जा रहा है.
• रोजगार: बालू खनन राज्य के ग्रामीण इलाकों में रोजगार का बड़ा जरिया है. इसमें सीधे तौर पर 50,000 से 70,000 मजदूर जुड़े हैं.
• अप्रत्यक्ष रोजगार: निर्माण क्षेत्र से जुड़े राजमिस्त्री, मजदूर, ठेकेदार और ट्रक-हाइवा मालिक-ड्राइवर समेत 3 से 4 लाख लोग इस उद्योग पर निर्भर हैं.
नीलामी की स्थिति
• कुल चिह्नित घाट: 444
• नीलामी पूर्ण: 298 घाट
• प्रक्रियाधीन: 146 घाट
• कई घाटों पर पर्यावरण मंजूरी नहीं मिलने से वैध उठाव शुरू नहीं हो सका है.
प्रमुख प्रोजेक्ट्स पर असर
• अबुआ आवास योजना: लाखों घरों का निर्माण बालू की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी के कारण प्रभावित.
• नल-जल योजना: पानी की टंकियों और पाइपलाइन कार्य में देरी.
• रांची रिंग रोड और फ्लाईओवर: कंक्रीटिंग और फिनिशिंग कार्य प्रभावित.
• पंचायत भवन और स्कूल: ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण कार्य ठप या धीमा.
