भगवान जगन्नाथ की पूजा क्यों की जाती है और आषाढ़ में ही क्यों निकलती है रथ यात्रा? जानिए पूरी कहानी

News Wave Desk : भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है. भगवान जगन्नाथ की पूजा पूरे...

भगवान जगन्नाथ

News Wave Desk : भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है. भगवान जगन्नाथ की पूजा पूरे देश में श्रद्धा और आस्था के साथ की जाती है. ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है. हर साल आषाढ़ महीने में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देते हैं.

भगवान जगन्नाथ की पूजा क्यों की जाती है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ को जगत के नाथ यानी पूरे संसार के स्वामी माना जाता है. भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का ही एक विशेष स्वरूप माना जाता है. यही कारण है कि भक्त भगवान जगन्नाथ की पूजा पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करते हैं. भक्तों का विश्वास है कि भगवान जगन्नाथ की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है और भगवान की कृपा बनी रहती है. लोग अपने परिवार की सुख-समृद्धि, सफलता और खुशहाली के लिए भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करते हैं. भगवान जगन्नाथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके साथ उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और छोटी बहन देवी सुभद्रा की भी पूजा की जाती है.

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का स्वरूप अलग क्यों है?

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों से काफी अलग दिखाई देती है. भगवान जगन्नाथ की बड़ी-बड़ी गोल आंखें हैं और उनके हाथ-पैर का स्वरूप भी सामान्य मूर्तियों जैसा नहीं है. धार्मिक कथा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न भगवान की एक दिव्य मूर्ति बनवाना चाहते थे. मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी ली थी, लेकिन उन्होंने शर्त रखी थी कि जब तक मूर्ति पूरी तरह तैयार न हो जाए, तब तक कोई दरवाजा नहीं खोलेगा. कहा जाता है कि राजा को चिंता हुई और उन्होंने समय से पहले दरवाजा खोल दिया. उस समय मूर्ति का निर्माण पूरी तरह पूरा नहीं हुआ था. इसी वजह से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का स्वरूप आज भी अनोखा दिखाई देता है. हालांकि यह धार्मिक मान्यता और पौराणिक कथा पर आधारित है.

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का स्वरूप
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का स्वरूप

 

आषाढ़ महीने में ही क्यों निकलती है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा?

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा हर साल आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है. हिंदू पंचांग के अनुसार यह तिथि आषाढ़ महीने में आती है. इसी वजह से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आषाढ़ महीने में ही आयोजित होती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की ओर जाते हैं. गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है. इसी वजह से रथ यात्रा को भगवान की वार्षिक यात्रा भी कहा जाता है. भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस दिन भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों के बीच आते हैं.आम दिनों में भक्त भगवान के दर्शन करने मंदिर जाते हैं, लेकिन रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ खुद अपने भक्तों के बीच पहुंचते हैं. इसी कारण रथ यात्रा को भगवान और भक्तों के मिलन का पर्व भी कहा जाता है.

तीन रथों पर सवार होते हैं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा

रथ यात्रा में तीन अलग-अलग रथ निकाले जाते हैं. भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष है. भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है, जबकि देवी सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है. भक्त इन रथों को रस्सियों से खींचते हैं. रथ खींचने को भक्त बेहद पुण्य और सौभाग्य का कार्य मानते हैं. रथ यात्रा के दौरान छेरा पहरा नाम की एक विशेष परंपरा निभाई जाती है. इस परंपरा में पुरी के राजा भगवान के रथ के सामने झाड़ू लगाकर सफाई करते हैं. इस परंपरा का संदेश बेहद खास है. यह बताता है कि भगवान के सामने राजा और आम इंसान सभी बराबर हैं. भगवान जगन्नाथ के सामने किसी में कोई भेदभाव नहीं है.

तीन रथों पर सवार
तीन रथों पर सवार

 

जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद भी है खास

भगवान जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद भी देशभर में प्रसिद्ध है. भक्तों के बीच महाप्रसाद का विशेष धार्मिक महत्व है. मान्यता है कि भगवान को अर्पित किए जाने के बाद यह प्रसाद भक्तों के लिए पवित्र बन जाता है. भगवान जगन्नाथ की परंपरा में प्रसाद को सभी भक्तों के लिए समान माना जाता है. यही भगवान जगन्नाथ की भक्ति में समानता और भाईचारे की भावना को दर्शाता है. भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भक्ति, समानता और सेवा का संदेश भी देती है. भगवान जगन्नाथ की परंपरा हमें सिखाती है कि भगवान सबके हैं और उनके सामने सभी बराबर हैं. रथ यात्रा यह संदेश भी देती है कि भक्त और भगवान के बीच प्रेम और आस्था का रिश्ता सबसे बड़ा होता है. यही वजह है कि हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में शामिल होने के लिए पुरी पहुंचते हैं और जय जगन्नाथ के जयकारे से पूरा शहर भक्तिमय हो जाता है.

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