Chakradharpur: पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर शहर में लगभग 300 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ रथयात्रा गुरुवार को श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ शुरू हुई. पुरानीबस्ती स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथयात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए. शाम करीब पांच बजे पारंपरिक विधि-विधान और विशेष पूजा-अर्चना के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा को सुसज्जित रथ पर विराजमान किया गया. इसके बाद रथयात्रा मंदिर परिसर से नगर भ्रमण के लिए निकली. श्रद्धालुओं ने जय जगन्नाथ के जयघोष के साथ रथ को खींचा. रथ को बड़दांडो मार्ग पर भाजपा के वरिष्ठ नेता अशोक सारंगी के आवास के समीप रोका गया, जहां भगवान रात्रि विश्राम करेंगे.

17 जुलाई को मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान करेंगे महाप्रभु
मिश्र परिवार के सदस्य प्रणव कुमार मिश्र ने बताया कि शुक्रवार 17 जुलाई की शाम पुनः रथयात्रा निकाली जाएगी और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा को मौसीबाड़ी स्थित गुंडिचा मंदिर ले जाया जाएगा. वहां सात दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन तथा महाप्रसाद वितरण का आयोजन होगा. निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद भगवान पुनः रथ पर सवार होकर श्री जगन्नाथ मंदिर लौटेंगे. चक्रधरपुर की रथयात्रा को जिले की सबसे प्राचीन और भव्य रथयात्राओं में गिना जाता है. मान्यता है कि यह परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है. इतिहासकारों के अनुसार, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा एवं पोड़ाहाट राजवंश के राजा अर्जुन सिंह भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे. बाद में उन्होंने भगवान की सेवा-पूजा की जिम्मेदारी मिश्र परिवार को सौंप दी. तभी से पुरानीबस्ती स्थित मंदिर में रथयात्रा की परंपरा निरंतर चली आ रही है.
10 पहियों के विशाल रथ से शुरू हुई थी ऐतिहासिक परंपरा
जानकारी के अनुसार, प्रारंभिक वर्षों में यहां 10 पहियों वाला विशाल रथ बनाया जाता था, लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव हुआ और वर्तमान में छह पहियों वाला पारंपरिक रथ तैयार किया जाता है. रथ निर्माण में आज भी धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय मान्यताओं का विशेष ध्यान रखा जाता है. रथयात्रा महोत्सव के दौरान चक्रधरपुर शहर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालु पुरानीबस्ती पहुंचे और प्रभु जगन्नाथ के दर्शन किए. वहीं भक्ति, श्रद्धा और मेले जैसा माहौल देखने को मिला. धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महत्व के कारण यह आयोजन चक्रधरपुर ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी सिंहभूम जिले की पहचान बन चुका है.
