हजारीबाग: 2023 में चला था बुलडोजर, 2026 में सिर्फ फाइलें! हुरहुरु की 50 डिसमिल खास महल जमीन पर आखिर किसका है ‘वरदहस्त’?

Hazaribagh: हजारीबाग के हुरहुरु स्थित खास महल की 50 डिसमिल जमीन इन दिनों पूरे जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है....

Hazaribagh,
हुरहुरु की 50 डिसमिल जमीन पर किसका 'वरदहस्त'? प्रशासन क्यों खामोश?

Hazaribagh: हजारीबाग के हुरहुरु स्थित खास महल की 50 डिसमिल जमीन इन दिनों पूरे जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है. यह जमीन अब महज एक भूखंड नहीं रह गई है, बल्कि जिला प्रशासन की कार्यशैली, साख और जवाबदेही की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बन चुकी है. सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस जमीन को साल 2023 में खुद जिला प्रशासन ने ‘अवैध अतिक्रमण’ घोषित करते हुए बुलडोजर चलाकर बाउंड्री तोड़ी थी, आज साल 2026 में उसी जमीन पर बार-बार कब्जे की कोशिश की जा रही है. अचरज की बात यह है कि कभी त्वरित कार्रवाई करने वाला पूरा प्रशासनिक तंत्र अब सिर्फ “फाइलों और कागजों की जांच” के मकड़जाल में उलझा हुआ नजर आ रहा है.

बिछी कब्जे की बिसात, ग्रीन नेट का मिला सहारा

बीते शनिवार, 19 जुलाई 2026 को हुरहुरु की इस विवादित जमीन पर अचानक हलचल बढ़ गई. आरोप है कि कुछ लोगों ने झाड़ियों और टिन की चादरों की आड़ में जमीन को ग्रीन नेट से घेरकर एक बार फिर कब्जे की कोशिश की. यह पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले 18 जून को भी इसी तरह जमीन की घेराबंदी का प्रयास किया गया था. जून में विवाद बढ़ने पर सदर अंचल अधिकारी दलबल के साथ मौके पर पहुंचे थे. उन्होंने काम रुकवाया और पूर्व मंत्री योगेंद्र साव से जमीन से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा था. साथ ही जांच शुरू करने की बात भी कही गई थी. हालांकि, एक महीने बीत जाने के बावजूद जांच का नतीजा सार्वजनिक नहीं किया गया. स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक सुस्ती के कारण शनिवार को फिर से कब्जे की कोशिश शुरू हो गई.

कभी झाड़ी, कभी हाइवा… ऐसे अपनाए जा रहे हथकंडे

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस कीमती जमीन पर कब्जा करने के लिए हर बार अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं. कभी जमीन के सामने हाइवा खड़ा कर दिया जाता है ताकि अंदर चल रही गतिविधियां बाहर से दिखाई न दें. कभी बड़ी-बड़ी झाड़ियों और टिन की चादरों की आड़ लेकर घेराबंदी की जाती है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर बार विरोध होने पर प्रशासन मौके पर पहुंचता है, काम रुकवाता है, दस्तावेज मांगता है और फिर मामला जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में चला जाता है.

पूर्व मंत्री का दावा, 2023 की कार्रवाई पर उठे सवाल

इस पूरे विवाद के केंद्र में पूर्व मंत्री योगेंद्र साव हैं. उनका दावा है कि सरकार ने यह जमीन कभी वापस नहीं ली और उनके पास इस जमीन से जुड़े सभी वैध एवं पुख्ता दस्तावेज मौजूद हैं. यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. अगर उनके पास वैध दस्तावेज हैं, तो साल 2023 में प्रशासन ने किस आधार पर इसे सरकारी जमीन बताते हुए बुलडोजर चलाया था? क्या उस समय बिना पर्याप्त जांच के कार्रवाई की गई थी? या फिर अब प्रभाव और दबाव के कारण जांच को जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है? इन सवालों का जवाब अब तक सामने नहीं आया है.

जनता को चाहिए स्पष्ट फैसला

हुरहुरु के स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन की ढुलमुल नीति से क्षेत्र का माहौल लगातार खराब हो रहा है. लोगों का कहना है कि यदि जमीन वास्तव में सरकारी है, तो बार-बार हो रही कब्जे की कोशिशों पर स्थायी रोक क्यों नहीं लगाई जा रही और दोषियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हो रही.वहीं, यदि जमीन निजी है और पूर्व मंत्री के दस्तावेज वैध हैं, तो जांच की प्रक्रिया कब पूरी होगी और उन्हें उनकी जमीन कब सौंपी जाएगी. स्थानीय लोगों का कहना है कि अब प्रशासन को फाइलों के बजाय स्पष्ट और अंतिम फैसला लेना चाहिए, ताकि पूरे मामले में दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.

ALSO READ: पलामू: पुलिस की बड़ी सफलता, 4 महीने बाद नाबालिग युवती की सुरक्षित घर वापसी

सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *