सरायकेला: खरसावां प्रखंड अंतर्गत नव प्राथमिक विद्यालय कोतवाल बादी में शिक्षा के साथ-साथ अब बच्चों को “प्यास सहने” का भी पाठ पढ़ाया जा रहा है. विद्यालय परिसर में सरकारी जलमीनार और चापानल तो हैं, लेकिन दोनों ही लंबे समय से खराब पड़े हैं, मानो व्यवस्था की असल तस्वीर खुद बयान कर रहे हों.
बच्चों की प्यास बुझाने की जिम्मेदारी अब स्कूल की नहीं, बल्कि गांव के एक चापानल की हो गई है, जहां जाकर छात्र-छात्राएं अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं. सवाल यह है कि जब स्कूल में संसाधन मौजूद हैं, तो वे सिर्फ दिखावे के लिए हैं या उपयोग के लिए.
प्रशासन की चुप्पी या अनदेखी
अभिभावकों का कहना है कि समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन समाधान आज तक नहीं हुआ. ऐसे में यह मान लेना गलत नहीं होगा कि जिम्मेदारों की नजर में यह “कोई बड़ी समस्या” नहीं है. अब सवाल खड़ा होता है कि क्या खरसावां प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को इस समस्या की जानकारी नहीं है, या फिर जानकारी होते हुए भी इसे नजरअंदाज किया जा रहा है. अगर बच्चों को शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा भी नहीं मिल पा रही है, तो फिर व्यवस्थाओं के दावे कितने खोखले हैं, यह समझना मुश्किल नहीं.
अभिभावकों ने मांग की है कि जल्द से जल्द इस समस्या का समाधान किया जाए, ताकि बच्चों को कम से कम पानी के लिए भटकना न पड़े और स्कूल सच में शिक्षा का केंद्र बन सके, न कि लापरवाही का उदाहरण.
