रांची: दवाओं के साथ-साथ सुइयों की चुभन, हर दिन पांच लाख इंजेक्शनों से हो रहा मरीजों का उपचार. झारखंड में सिरिंज का सालाना कारोबार 80 करोड़ तक पहुंच गया है.
झारखंड के स्वास्थ्य तंत्र में दवाओं के साथ इंजेक्शन का उपयोग एक अहम हिस्सा बन चुका है. राज्य के सुदूरवर्ती प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर राजधानी रांची के रिम्स जैसे चिकित्सा संस्थानों तक, शायद ही कोई ऐसा मरीज हो जिसके उपचार का सिरा किसी न किसी इंजेक्शन से न जुड़ा हो. झारखंड के सरकारी और निजी अस्पतालों में हर दिन लाखों इंजेक्शनों की खपत हो रही है.
80 करोड़ का कारोबार
एक साधारण सिरिंज की औसत कीमत थोक और खुदरा मिलाकर 3 से 5 रुपये के बीच है. झारखंड में सिरिंज का बाजार काफी बड़ा हो चुका है. इसका दैनिक टर्नओवर लगभग 15 से 25 लाख रुपये है. वहीं मासिक कारोबार 4.5 करोड़ से 7.5 करोड़ रुपये के बीच रहता है. कुल मिलाकर सिरिंज और नीडल का सालाना कारोबार झारखंड में 60 करोड़ से 80 करोड़ रुपये के बीच आंका गया है. स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के साथ इंजेक्शन की मांग में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है.
क्या कहते हैं आंकड़े
राज्य में लगभग 4,428 सरकारी स्वास्थ्य संस्थान हैं, जिनमें उप-स्वास्थ्य केंद्र से लेकर मेडिकल कॉलेज तक शामिल हैं. यहां नियमित टीकाकरण, ओपीडी और इमरजेंसी सेवाओं में प्रतिदिन औसतन 2.5 लाख से 3 लाख इंजेक्शन और सिरिंज का उपयोग किया जाता है.
वहीं निजी क्षेत्र में छोटे नर्सिंग होम से लेकर बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों तक प्रतिदिन लगभग 1.5 लाख से 2 लाख इंजेक्शनों का उपयोग होता है. इस तरह पूरे राज्य में रोजाना लगभग 4 लाख से 5 लाख इंजेक्शन इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
इंजेक्शन के प्रकार और उपयोग
डाइक्लोफेनाक इंजेक्शन का उपयोग मुख्य रूप से दर्द निवारण के लिए किया जाता है, जिसकी सालाना मांग 1,00,000 एम्पुल से अधिक है. रैनिटिडीन इंजेक्शन गैस और एसिडिटी के इलाज में इस्तेमाल होता है, जिसकी मांग करीब 10,00,000 एम्पुल है.
जेंटामाइसिन इंजेक्शन एक एंटीबायोटिक है, जिसकी सालाना मांग लगभग 2,60,000 एम्पुल है. वहीं ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का उपयोग प्रसव के दौरान किया जाता है, जिसकी सालाना मांग करीब 1,90,000 एम्पुल है.
