दो दशक से इंसाफ को तरसती देवंती देवी: इचाक में सरकारी दावों की खुली पोल, 2006 के हादसे ने छीना था सुहाग, आज प्लास्टिक के तंबू में कट रही जिंदगी

Hazaribagh: कहते हैं जब इंसान पर दुखों का पहाड़ टूटता है, तो सरकारें और व्यवस्थाएं उसका संबल बनती हैं. लेकिन हजारीबाग जिले...

Hazaribagh: कहते हैं जब इंसान पर दुखों का पहाड़ टूटता है, तो सरकारें और व्यवस्थाएं उसका संबल बनती हैं. लेकिन हजारीबाग जिले के इचाक प्रखंड के कुटुंब सुकडी ग्राम पंचायत से जो कहानी सामने आई है, वह इस भरोसे को तार-तार कर देती है. यहां कबीर की वह कहावत अक्षरशः सच साबित हो रही है–”सबै सहायक सबल के, कोऊ न निबल सहाय”. एक लाचार विधवा पिछले 20 साल से सरकारी दफ्तरों की चौखट पर सिर्फ एक अदद छत की भीख मांग रही है, लेकिन बाबुओं की संवेदनहीनता ने उसके आंसुओं को भी फाइलों में दफन कर दिया है.

एक पल की दुर्घटना और बिखर गया हंसता-खेलता संसार

यह कहानी है लगभग 60 वर्षीय देवंती देवी की. साल 2006 का वह काला दिन देवंती कभी नहीं भूल सकतीं. एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना ने उनके हंसते-खेलते परिवार को पल भर में उजाड़ दिया. इस हादसे में उनके पति स्वर्गीय कैलाश ठाकुर और एक बेटे की मौत हो गई. मांग का सिंदूर उजड़ा तो सात बच्चों (पांच पुत्रियां और दो पुत्र) की जिम्मेदारी देवंती के कमजोर कंधों पर आ गिरी. उस दिन के बाद से वह सिर्फ एक विधवा नहीं बनीं, बल्कि अपने परिवार की एकमात्र ढाल और कमाऊ सदस्य भी बन गईं.

फुटहा चना बेचकर पाला पेट, समाज के सहारे रची बेटियों की शादी

पति और एक जवान बेटे को खोने के बाद देवंती के पास रोने का भी वक्त नहीं था. पेट की आग बुझाने और बच्चों को जिंदा रखने के लिए उन्होंने गांव-गांव घूमकर ‘फुटहा चना’ बेचना शुरू किया. दिनभर की तपस्या से जो चंद पैसे मिलते, उससे बच्चों का आधा पेट भरता. वक्त गुजरा, बेटियां सयानी हुईं. एक गरीब मां के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह शादी का खर्च उठा सके. ऐसे में समाज के सहृदय लोगों ने हाथ आगे बढ़ाया और जैसे-तैसे पांचों बेटियों की शादियां संपन्न हुईं. आज उनका दूसरा बेटा मात्र 18-20 वर्ष का है, जो कड़े संघर्ष के बीच पढ़ाई और रोजगार की दोहरी मार झेल रहा है.

2006 से 2026 तक एक ही फरियाद: “साहब! एक घर दे दो, बरसात में पानी टपकता है, जाड़े में थर-थर कांपती हूं.”

साल 2006 से लेकर आज 2026 आ गया, यानी दो दशक बीत गए, लेकिन देवंती देवी की यह गुहार इचाक प्रखंड कार्यालय के बंद कमरों और बाबुओं के बहरे कानों तक नहीं पहुंच सकी. देवंती देवी न जाने कितनी बार प्रखंड कार्यालय गईं, हर बड़े-छोटे अधिकारी के सामने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाईं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ कागजी आश्वासन मिला, पक्की छत नहीं.

संपन्नों को ‘मेहरबानी’, जरूरतमंद को सिर्फ ‘इंतजार’

गांव की कड़वी हकीकत यह है कि जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, जिनके पास पक्के मकान हैं, उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ आसानी से मिल गया. रसूखदारों के घर की फाइलें तुरंत पास हो गईं. दूसरी तरफ, देवंती देवी आज भी केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना और राज्य सरकार की अबुआ आवास योजना दोनों से पूरी तरह वंचित हैं.

आज उनका आशियाना एक जर्जर, टूटता हुआ मकान है, जिसकी छत गिर चुकी है. इस गिरते हुए मलबे पर उन्होंने एक प्लास्टिक का तंबू तान रखा है. इसी प्लास्टिक के नीचे वह बरसात का पानी, ठंड की ठिठुरन और जून की तपती धूप झेलने को मजबूर हैं. यह दृश्य ‘हर घर आवास’ का ढोल पीटने वाली सरकार के मुंह पर करारा तमाचा है.

व्यवस्था से सीधे सवाल: आखिर दोषी कौन?

देवंती देवी की यह बेबसी जिला और प्रखंड प्रशासन से कुछ कड़े सवाल पूछती है कि किसके लिए बनती हैं योजनाएं? अगर समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़ी एक बेहद गरीब, बेसहारा और विधवा महिला को आवास नहीं मिल सकता, तो ये योजनाएं किसके लिए हैं? क्या सर्वे एक धोखा है? जब गांव में आवास का सर्वे हो रहा था, तो क्या अधिकारियों की आंखें बंद थीं? पात्रता की जांच ईमानदारी से क्यों नहीं की गई? हाशिए पर क्यों धकेला? क्या जानबूझकर गरीबों के हक को मारकर रसूखदारों की जेबें भरी गईं?

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अब पानी सिर से ऊपर है: तत्काल संज्ञान ले प्रशासन

यह सिर्फ देवंती देवी की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारी प्रशासनिक संवेदनहीनता और व्यवस्था की सड़न का जीता-जागता सबूत है. अब जरूरत है कि हजारीबाग जिला प्रशासन और इचाक प्रखंड के अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लें. देवंती देवी को अविलंब प्रधानमंत्री आवास या अबुआ आवास योजना का लाभ दिया जाए, ताकि सरकारी योजनाएं कागजों के दलदल से निकलकर इस बेसहारा मां की जमीनी हकीकत बन सकें.

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