Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य सरकार को सभी जिला अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में समर्पित बर्न यूनिट (जले हुए मरीजों के लिए विशेष उपचार इकाई) को चालू करने का निर्देश दिया है. यह आदेश हजारीबाग में केरोसिन आग की घटना (वर्ष 2021) के पीड़ितों की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया.
इलाज व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य भर में जलने के पीड़ितों के इलाज की व्यवस्थित विफलता पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि बिना किसी कार्यात्मक बर्न यूनिट के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार एक भ्रम मात्र रह जाता है.
हजारीबाग अग्निकांड का संदर्भ
यह मामला तब उठा जब हजारीबाग में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से वितरित अत्यधिक ज्वलनशील और मिलावटी केरोसिन के कारण आग लग गई. इस हादसे में चार लोगों की मौत हो गई, जिनमें एक दो साल का बच्चा और एक बुजुर्ग महिला शामिल थी. लगभग 15 अन्य लोग गंभीर रूप से झुलस गए और कई के चेहरे स्थायी रूप से विकृत हो गए. पीड़ितों को सदर अस्पताल, हजारीबाग में पर्याप्त उपचार नहीं मिल पाया क्योंकि वहां कोई विशेष बर्न यूनिट नहीं थी. अदालत ने यह भी पाया कि वितरित केरोसिन का फ्लैश प्वाइंट मात्र 13.5°C था, जबकि सुरक्षा मानक के अनुसार न्यूनतम 35°C होना चाहिए था.
120 दिनों में बर्न यूनिट अनिवार्य
अदालत ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया है कि सभी जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में समर्पित बर्न यूनिट 120 दिनों के भीतर पूरी तरह कार्यात्मक बनाई जाएं. प्रशिक्षित डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, जरूरी उपकरण और दवाइयों की 24×7 उपलब्धता सुनिश्चित की जाए. जलने के मरीजों को सामान्य वार्ड में नहीं, बल्कि केवल विशेष बर्न यूनिट में ही इलाज दिया जाएगा.
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प्रशिक्षण और व्यवस्था पर जोर
डॉक्टरों और नर्सों के लिए 90 दिनों के भीतर बर्न केयर में प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाएं. हालांकि अदालत ने याचिका में मांगे गए 50 लाख रुपये (मृतकों) और 35 लाख रुपये (विकलांगों) के तत्काल मुआवजे को मंजूरी नहीं दी, लेकिन पीड़ितों के लिए मुआवजे का रास्ता साफ कर दिया.
मुआवजा पाने का रास्ता खुला
अदालत ने कहा कि पीड़ित या उनके उत्तराधिकारी मुफस्सिल थाना मामला संख्या 45/2021 में अदालत के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 357-ए के तहत पीड़ित मुआवजा योजना के तहत आवेदन कर सकते हैं. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) को इन पीड़ितों की पहचान कर आवेदन में मदद करने का निर्देश भी दिया गया है. अदालत ने सुनिश्चित किया है कि इस तरह के आवेदन पर तीन महीने के भीतर सुनवाई हो.
सरकारी दावों पर सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के हलफनामे में गंभीर विसंगतियां पाईं. जहां सरकार ने दावा किया कि सभी 24 जिलों में बर्न वार्ड काम कर रहे हैं, वहीं दाखिल आंकड़ों में सिर्फ 22 इकाइयों का जिक्र था और कई जिले लापता थे.
CAG रिपोर्ट का हवाला
इससे पहले, 2021 की कैग (CAG) रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि 2014-2017 के बीच 20 बर्न यूनिट बनाकर भी चालू नहीं किए जा सके. अदालत ने इसे कागजी अनुपालन करार दिया और कहा कि स्वास्थ्य का अधिकार सिर्फ दिखावे से पूरा नहीं होता.
