नदी के आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को समझने की आवश्यकता: जलपुरुष राजेंद्र सिंह

रांचीः देश के जाने-माने पर्यावरणविद् और मैगसेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष प्रो. राजेंद्र सिंह ने कहा है, कि जब भी कोई नदी सूखती...

Jalpurush Rajendra Singh
जलपुरुष राजेंद्र सिंह

रांचीः देश के जाने-माने पर्यावरणविद् और मैगसेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष प्रो. राजेंद्र सिंह ने कहा है, कि जब भी कोई नदी सूखती है, तब-तब वहां की सभ्यता बर्बाद हो जाती है. अपराध भी बढ़ जाता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर में नदी के आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है. तीसरा विश्वयुद्ध शायद जल की वजह से ही होगा. आज जो जल की बात करते हैं, प्रकृति को भगवान मानते हैं, उन्हें व्यवस्था द्रोही माना जाता है. आज लोकतंत्र कॉर्पोरेट और कांट्रैक्ट से चल रहा है. नदी की जमीन की पहचान कर ग्रीन जोन, ब्लू जोन और रेड जोन में बांट ले. पहले सिर्फ दो राज्यों में सूखा पड़ता था, अब 17 राज्यों में सूखा पड़ता है.  इसका मुख्य कारण है अनियमित वर्षा का पैटर्न. राजस्थान में अब भी सूखा होता और कहीं-कहीं बाढ़ भी आता है. समस्या गंभीर है. ग्राउंडवाटर रिचार्ज की जबरदस्त कमी है.

टिकाऊ समाधान के लिए विज्ञान और तकनीकी को जोड़ना होगा

जलपुरुष ने कहा कि टिकाऊ समाधान के लिए विज्ञान और तकनीकी को जोड़ना होगा. फसल के पैटर्न को वर्षा के पैटर्न से जोड़ने से किसानों को लाभ मिलेगा. पिछले साल अरावली की परिभाषा ही बदल दी गई थी. अगर वो अपने इरादों में कामयाब हो जाती, तो दिल्ली अगले पंद्रह साल में खत्म हो जाती. उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 के कॉप 21 के पहले क्लाइमेट चेंज की परिभाषा में जल था ही नहीं, सिर्फ  वायु था. बरसात के जल को इकट्ठा कर बांध बनाने से राजस्थान की जल समस्या की स्थिति में बदलाव आया. ऐसा करने से नदिया पुर्नजीवित होने लगी हैं. अब तक 23 नदियां जीवित की जा चुकी हैं. नादियों के प्रवाह का अधिकार भारत सरकार के पास है, लेकिन बारिश के पानी पर अधिकार राज्य सरकार के पास है.

एनवायरनमेंट क्लीयरेंस लेने के बाद उद्योग ही प्रदूषण फैलाते हैः प्रो गुरदीप सिंह

विनोभा भावे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और नॉर्मी रिसर्च फाउंडेशन के प्रो. गुरदीप सिंह ने कहा, कि धनबाद में गर्मी में पानी की किल्लत हो जाती है. जाउंडिस, कॉलेरा के कई मामले धनबाद में सामने आते हैं. एनवायरनमेंट क्लीयरेंस लेने के बाद उद्योग ही प्रदूषण फैलाते हैं.  राष्ट्रीय जल नीति विभिन्न मांगों को पूरा करने के लिए जल की उपलब्धता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देती है. धनबाद में 83.5 मिलियन गैलन प्रति दिन जल की आवश्यकता है, जबकि आपूर्ति प्रति दिन 61 मिलियन गैलन की ही है. उन्होंने खनन से निकलने वाले जल को ट्रीट कर पानी का हार्डनेस कम करने का उदाहरण दिया.

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