न्यूज वेब खासः झारखंड कैडर के आइएफएस अफसरों का रहा विवादों से गहरा नाता, मांस खरीद में भी खाया कमिशन, जेल गये, क्रिमिनल केस भी जारी

रांची : झारखंड कैडर के आइएफएस अफसरों का विवादों से गहरा नाता रहा है. आरोपी अफसरों की लिस्ट लंबी होती जा रही...

रांची : झारखंड कैडर के आइएफएस अफसरों का विवादों से गहरा नाता रहा है. आरोपी अफसरों की लिस्ट लंबी होती जा रही है. राज्य गठन के बाद से अब तक 35 आइएफएस अफसरों पर गंभीर आरोप हैं. अब तक जिन अफसरों पर गंभीर आरोप लगा है, उन पर कारर्वाई के नाम पर सिर्फ लीपापोती ही की गई. कई अफसर रिटायर भी हो गए. अफसरों ने जानवरों का भी हक मारने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. जानवरों को दिये जाने वाले मांस में भी कमिशन खाया. लगभग 14 लाख रुपये के मांस खरीद में गबन हुआ. इस मामले की भी लीपा-पोती कर दी गई. अब यह मामला ठंढ़े बस्ते में डाल दिया गया है.

क्या है मांस खरीद का मामला:

मांस की खरीद अन्य उद्यानों की तुलना में अधिक दर पर की गई. जैविक उद्यान में बाघ को प्रतिदिन 8 किलोग्राम, शेर को प्रतिदिन 10 किलोग्राम, तेंदुआ को प्रतिदिन 6 किलोग्राम, लकड़बग्घा को प्रतिदिन 4 किलोग्राम, गरूड़ को प्रतिदिन 1 किलोग्राम मांस दिया जाता है. घड़ियाल को प्रतिदिन 5 किलोग्राम मछली व मुर्गा दिया जाता है. इन सभी का आरोप पूर्व पीसीसीएफ वन्य प्राणी प्रदीप कुमार पर लगा.

50 करोड़ से भी अधिक की अनियमितता:

आइएफएस अफसरों ने 50 करोड़ से भी अधिक की अनियमितता की है. इसमें प्रमुख रूप से हाथी दांत और जानवरों की खाल तस्करी में सहयोग करने, अवैध आरा मिल को लाइसेंस देने, जंगल की जमीन बेचना, कैंपा फंड में घोटाला करने, एफडीए में सरकारी राशि का गबन,सोलर लैंप में घोटाला, सागवान-खैर की लकड़ी बेचने जैसे गंभीर आरोप हैं. इस पर कार्रवाई के नाम पर अब तक सिर्फ लीपा-पोती ही हुई है. आइएफएस अफसर वी जयराम रिटायर तो हो गये हैं, लेकिन वित्तीय अनियमितता के कारण इनके खिलाफ अब तक क्रिमिनल केस चल ही रहा है. सरकार ने इन्हें फरार घोषित भी किया था और वे जेल भी गये.

अभियोजन की स्वीकृति भी मांगी गई:

बिहार सरकार ने झारखंड कैडर के तीन आइएफएस अफसरों के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मांगी थी. इसके बावजूद राज्य सरकार ने अभियोजन की स्वीकृति नहीं दी. एकीकृत बिहार के समय इन अफसरों पर कई गंभीर आरोप थे. इन अफसरों में पूर्व पीसीसीएफ बीसी निगम, सर्वेश सिंघल और महेंद्र कर्दम शामिल हैं. इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

ये अफसर रिटायर हो गए, आरोपों की हो गई लीपापोती:

– धीरेंद्र कुमार : झारक्राफ्ट के पूर्व एमडी: हाथी दांत तस्करी का आरोप

– प्रदीप कुमार : पूर्व पीसीसीएफ- मांस खरीद में अनियमितता का आरोप

– सीपी खंडूजा : अवैध आरा मिल को लाइसेंस देने का आरोप

– प्रदीप कुमार : पूर्व पीसीसीएफ ,जंगल की जमीन बेचने का आरोप

– बीएन द्विवेदी : राशि गबन का आरोप

– आरके सिन्हा : राशि गबन का आरोप

– सत्यजीत सिंह : सागवान और खैर की लकड़ी बेचने का आरोप

– केएन ठाकुर : सरकारी वाहन बेचने का आरोप

– कुमार आशुतोष : एफडीए में सरकारी राशि के गबन का आरोप

– अजीत कुमार सिंह : कैंपा फंड में घोटाला का आरोप

– नागेंद्र बैठा : कैंपा फंड में घोटाला का आरोप

– यूएन विश्वास : कुनकी हाथी लाने में अनियमितता का आरोप

– रवि रंजन : सरकारी राशि के गबन का आरोप

इन अफसरों पर चली विभागीय कार्रवाई:

– आरके सिन्हा: 1988 बैच के आइएफएस अफसर आरके सिन्हा पर प्रदूषण बोर्ड में सचिव रहते हुए अनियमितता का आरोप लगा. इसके बाद लातेहार में डीएफओ रहते हुए वित्तीय अनियमितता का आरोप लगा. इनके खिलाफ विभागीय चली. नतीजा यह हुआ कि कोई प्रमोशन नहीं मिला पाया.

– पारितोष उपाध्याय: पारितोष उपाध्याय पीसीसीएफ रैंक के अफसर हैं. उपाध्याय 1992 बैच के हैं. बांस गैबियन में अनियमितता बरतने का आरोप लगा। ये जनवरी में रिटायर हो गए.

– राजीव रंजन: 1998 बैच के आएफएस अफसर हैं. इनके खिलाफ पौधारोपण में गड़बड़ी और जंगल की जमीन हेरा-फेरी करने का आरोप है. हजारीबाग में 1600 एकड़ वन भूमि के गायब होने का मामला इनसे जुड़ा हुआ है.

– पीसी मिश्रा: अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) रैंक के अफसर पीसी मिश्रा के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई चली.खेल गांव में हुए घोटाले में इनका मामला निगरानी में भी चला. वे भी रिटायर हो गए.

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