रांची: झारखंड में प्रशासनिक गलियारों में अक्सर यह चर्चा रहती है कि सीधी भर्ती के आईएएस अधिकारी तो समय पर सीढ़ियां चढ़ जाते हैं. लेकिन राज्य सेवा से पदोन्नत होकर आए आईएएस अधिकारियों के लिए सचिव की कुर्सी आज भी एक बड़ा पड़ाव है. राज्य गठन के 24 वर्षों बाद भी ऐसे अधिकारियों की संख्या बेहद कम है, जो सचिव या उससे ऊपर के रैंक तक पहुंच सके हैं.
33 फीसदी पद पदोन्नति से भरे जाते हैं
झारखंड में आईएएस के 33 फीसदी पदों पर राज्य सेवा और गैर-राज्य सेवा जैसे डॉक्टर और इंजीनियरों की पदोन्नति होती है. इनमें से गैर-राज्य सेवा के लिए 15 फीसदी का कोटा निर्धारित है.
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क्यों अटकती है सचिव की कुर्सी
• उम्र का तकाजा : राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अक्सर 45-50 वर्ष की आयु के बाद आईएएस बनते हैं. सचिव बनने के लिए आईएएस के रूप में लगभग 16-18 साल की सेवा अनिवार्य है. तब तक अधिकांश अफसर सेवानिवृत्ति की आयु (60 वर्ष) तक पहुंच जाते हैं.
• यूपीएससी और राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी: समय पर वैकेंसी की गणना न होना और यूपीएससी को प्रस्ताव भेजने में देरी से पदोन्नति की प्रक्रिया सालों लटकी रहती है. झारखंड हाईकोर्ट ने भी पूर्व में इस सुस्ती पर कड़ी टिप्पणी की थी.
• विभागीय जांच और एसीआरः कई काबिल अफसरों की पदोन्नति उनके खिलाफ लंबित विभागीय जांच या खराब एसीआर के कारण रुक जाती है.
• नियमों की पेचीदगी: राज्य सेवा से आईएएस में आने के बाद वरिष्ठता निर्धारण में होने वाली देरी उनके करियर के ग्राफ को धीमा कर देती है.
• सीधी भर्ती बनाम प्रमोटी कोटा: झारखंड में आईएएस के कुल स्वीकृत पदों (लगभग 224) में से 33 फीसदी पद पदोन्नति के लिए आरक्षित हैं. लेकिन रिक्तियों को भरने में होने वाली देरी से प्रमोटी अफसरों का बैच पीछे रह जाता है.
