Women’s Day 2026: बोकारो की अमलो रेलवे साइडिंग में महिलाओं का साहस, चला रहीं भारी फीडर ब्रेकर मशीन

Bokaro: बोकारो स्थित सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) के ढोरी एरिया के अंतर्गत कोल इंडिया की मेगा परियोजना एएओडीसीएम के अमलो रेलवे साइडिंग...

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Bokaro: बोकारो स्थित सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) के ढोरी एरिया के अंतर्गत कोल इंडिया की मेगा परियोजना एएओडीसीएम के अमलो रेलवे साइडिंग में महिलाएं मेहनत और साहस की नई मिसाल पेश कर रही हैं। यहां चार महिलाएं भारी-भरकम फीडर ब्रेकर मशीनों को पूरी निर्भीकता के साथ संचालित कर रही हैं। दोपहर करीब एक बजे रेलवे साइडिंग परिसर में लगी छह फीडर ब्रेकर मशीनों में से चार मशीनें महिलाओं द्वारा संचालित होती दिखाई देती हैं। चारों ओर फैली कोयले की धूल और हवा में उड़ते कणों के बीच ये महिलाएं लोहे की ऊंची सीढ़ियां चढ़कर मशीन तक पहुंचती हैं और कोयले के बड़े-बड़े टुकड़ों को क्रश कर उत्पादन कार्य में अपना योगदान देती हैं।

कोयले की धूल और ऊंचाई के बीच रोज करती हैं काम

परियोजना के फेस से आने वाले कोयले को इन फीडर ब्रेकर मशीनों में क्रश किया जाता है। इसके बाद क्रश किए गए कोयले को रेलवे साइडिंग में वैगनों में लोड कर देश के विभिन्न पावर प्लांटों तक भेजा जाता है। यहां रोजाना लगभग चार से पांच हजार टन कोयला क्रश किया जाता है। सुबह छह बजे से दोपहर दो बजे तक जनरल शिफ्ट में ये महिलाएं मशीनों का संचालन करती हैं। छह नंबर फीडर ब्रेकर मशीन इतनी ऊंचाई पर स्थित है कि कोयले से ढकी लोहे की सीढ़ियां चढ़ना किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन ये महिलाएं रोज उसी रास्ते से ऊपर चढ़कर अपना काम करती हैं।

चरकी, कुन्नी, गंगा और तुलसी का हौसला प्रेरणादायक

अमलो साइडिंग में कार्यरत कुन्नी कुमारी पिछले आठ वर्षों से फीडर ब्रेकर मशीन चला रही हैं। इससे पहले वह यहां पीउन के पद पर कार्यरत थीं। वर्ष 2016 में ढोरी के तत्कालीन जीएम कोटेश्वर राव की प्रेरणा से उन्होंने मशीन चलाना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें झिझक हुई, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इस काम में महारत हासिल कर ली। अब मशीन में तकनीकी खराबी आने पर वह उसे खुद ठीक भी कर लेती हैं। चरकी कुमारी वर्ष 2014 से फीडर ब्रेकर मशीन चला रही हैं। पहले वह भी अमलो परियोजना में पीउन के पद पर कार्यरत थीं। जब उन्हें पहली बार मशीन चलाने की जिम्मेदारी मिली तो वह काफी घबराई हुई थीं, लेकिन सीखने की इच्छा ने उन्हें इस काम में दक्ष बना दिया। पिता के निधन के बाद उन्हें यह नौकरी मिली थी।

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कठिन परिस्थितियों में भी नहीं हारीं हिम्मत

तुलसी कुमारी भी पिछले आठ वर्षों से क्रशर मशीन चला रही हैं। पहले वह अमलो परियोजना के 12 नंबर क्षेत्र में पीउन के रूप में काम करती थीं। पहली बार मशीन चलाने की जिम्मेदारी मिलने पर उन्हें डर लगा, लेकिन साथियों के सहयोग और प्रेरणा से उन्होंने इस काम को अच्छी तरह सीख लिया। वर्ष 1996 में उनकी मां सोनी देवी के निधन के बाद उन्हें यह नौकरी मिली थी। गंगा देवी वर्ष 2017 से मशीन ऑपरेट कर रही हैं। पहले वह भी पीउन के पद पर थीं। पति के निधन के बाद उन्हें सीसीएल में नौकरी मिली और आज वह पूरे आत्मविश्वास के साथ भारी मशीनों का संचालन कर रही हैं।

देश के विकास में योगदान पर गर्व

महिला ऑपरेटरों का कहना है कि आज महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। उन्होंने बताया कि कोयले से देश को बिजली मिलती है और इस प्रक्रिया का हिस्सा बनकर उन्हें गर्व महसूस होता है।

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आठ वर्षों से नहीं मिला प्रमोशन

महिलाओं ने यह भी बताया कि पिछले आठ वर्षों से उन्हें प्रमोशन नहीं मिला है। उन्होंने अधिकारियों से इस ओर ध्यान देने की मांग की है। वहीं चरकी देवी ने कहा कि पहले वह ब्लास्टिंग के काम में जाना चाहती थीं, लेकिन बाद में इस मशीन पर काम शुरू किया और आज वह आत्मविश्वास के साथ इसे चला रही हैं।

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