रांची: झारखंड के पावर प्लांटों में नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पूरी क्षमता से काम करने के लिए प्रतिदिन औसतन 50,000 से 60,000 टन कोयले की आवश्यकता होती है. सामान्यत: 1 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए लगभग 0.6 से 0.7 टन कोयले की जरूरत होती है.
राज्य के पावर सेक्टर को अपनी पूर्ण क्षमता पर चलाने के लिए सालाना लगभग 20 से 22 मिलियन टन कोयले की खपत होती है. हालांकि, झारखंड धीरे-धीरे सोलर और अन्य हरित ऊर्जा की ओर कदम बढ़ा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक कोयले की खपत स्थिर करने के साथ सौर ऊर्जा का हिस्सा बढ़ाया जाएगा. लेकिन फिलहाल ब्लैक डायमंड (कोयला) ही झारखंड की बिजली का मुख्य आधार है.
वर्तमान में अधिकांश पावर प्लांटों में औसतन 15 से 19 दिन का कोयला स्टॉक मौजूद है, जिससे बिजली संकट का खतरा कम रहता है. प्रतिदिन लगभग 15 से 20 कोयला रैक (मालगाड़ी) केवल राज्य के भीतर पावर प्लांटों में बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल की जाती हैं.
राज्य के प्रमुख पावर प्लांट और दैनिक कोयला खपत
अडानी पावर (गोड्डा): राज्य का सबसे बड़ा और आधुनिक प्लांट. दो इकाइयों (800 मेगावाट) के संचालन के लिए प्रतिदिन लगभग 18,000 से 20,000 टन कोयले की खपत होती है.
तेनुघाट विद्युत निगम लिमिटेड, लालपनिया: 210 मेगावाट की दो इकाइयों में प्रतिदिन लगभग 4,000 से 5,000 टन कोयला जलता है.
चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन (डीवीसी): प्रतिदिन करीब 7,000 से 9,000 टन कोयला खपत होती है.
कोडरमा थर्मल पावर स्टेशन: दो इकाइयों (500 मेगावाट) के संचालन के लिए प्रतिदिन लगभग 12,000 से 14,000 टन कोयला जरूरत पड़ती है.
मैथन पावर (टाटा पावर + डीवीसी संयुक्त उपक्रम): प्रतिदिन लगभग 10,000 से 12,000 टन कोयला इस्तेमाल होता है.
बोकारो थर्मल: प्रतिदिन औसतन 4,000 से 6,000 टन कोयला जलता है.
