रांची: झारखंड को देश का कोल हब कहा जाता है. पिछले ढाई दशकों में अपनी बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी ही धरती के सीने से निकले करोड़ों टन कोयले को भट्टी में झोंक दिया है. राज्य गठन के बाद से अब तक पावर प्लांटों में जलने वाले इस कोयले की कीमत का अनुमान लगाया जाए, तो यह आंकड़ा राज्य के कई वार्षिक बजटों के योग से भी अधिक बैठता है.
राजस्व बनाम खर्च
राज्य को कोयले पर मिलने वाली रॉयल्टी से राजस्व तो प्राप्त होता है, लेकिन पावर प्लांटों में इसी कोयले को जलाकर बिजली खरीदने पर राज्य को भारी वित्तीय बोझ भी उठाना पड़ता है. इतने वर्षों में कोयला जलने के बाद अरबों टन राख पैदा हुई है, जो राज्य के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बन गई है. सीएजी की रिर्पोट में इस बात की भी उल्लेख किया गया है कि झारखंड के सरकारी पावर प्लांटों में कोयले की विशिष्ट खपत मानक से अधिक रही है. पुरानी मशीनों के कारण कम बिजली बनाने के लिए ज्यादा कोयला जलाया गया, जिससे राज्य को आर्थिक नुकसान हुआ.
ऐसा है कोयले की खपत का गणित
- झारखंड में वर्तमान में स्थापित थर्मल पावर प्लांट से बिजली उत्पादन की क्षमता लगभग 3200 मेगावाट से अधिक है, इसमें केंद्रीय, राज्य और निजी क्षेत्र के पावर प्लांट भी शामिल हैं.
- एक सामान्य थर्मल पावर प्लांट को 1 यूनिट बिजली बनाने के लिए लगभग 0.6 से 0.7 किलोग्राम कोयले की आवश्यकता होती है.
- झारखंड के मुख्य प्लांट पतरातू-पुराना, टीवीएनएल और डीवीसी के प्लांट मिलकर सालाना औसतन 1.5 से 2 करोड़ टन कोयले की खपत करते रहे हैं.
- राज्य गठन से अब तक का औसत देखा जाए, तो झारखंड की भट्टियों में अनुमानित 35 करोड़ से 45 करोड़ टन कोयला जलाया जा चुका है.
- कोयले की कीमत ग्रेड के आधार पर तय होती है.
- राज्य गठन के बाद से कोयले की कीमतें 600 रुपए प्रति टन से बढ़कर 3000 से 4000 रुपए प्रति टन तक पहुंच गई है.
- राज्य गठन से अब तक औसत कीमत 1,500 प्रति टन भी मानें, 35 करोड़ टन और अधिकतम 45 करोड़ टन होता है.
- इस हिसाब से झारखंड के पावर प्लांटों में अब तक 60,000 करोड़ से 80,000 करोड़ मूल्य का कोयला जलाया जा चुका है.
