रांची. झारखंड लाइटनिंग हॉटस्पॉट के रूप में तेजी से उभर कर सामने आया है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और क्लाइमेट रेजिलिएंट ऑब्जर्विंग सिस्टम्स प्रमोशन काउंसिल की वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में हर साल औसतन 4 लाख से 5 लाख बार आसमानी बिजली जमीन से टकराती है. यह आंकड़ा झारखंड की गंभीर स्थिति को दर्शाता है, जहां वज्रपात एक बड़ी प्राकृतिक चुनौती बन चुका है.
इन जिलों में सबसे अधिक प्रहार
चतरा, पलामू, हजारीबाग और लोहरदगा जैसे जिलों में वज्रपात की सघनता राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक दर्ज की गई है. इन इलाकों में आसमानी बिजली का खतरा लगातार बना रहता है. विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे अधिक घटनाएं प्री-मानसून और मानसून के आगमन के समय यानी जून और जुलाई में देखने को मिलती हैं. यही वजह है कि इन महीनों में लोगों को विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता होती है.
ठनका के प्रहार से 5000 से अधिक मौत
राज्य के पठारी इलाकों और विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण यहां ठनका का प्रभाव देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में अधिक भयावह हो गया है. सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञों की मानें तो झारखंड के गठन से लेकर अब तक वज्रपात की घटनाओं में 5000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. यह संख्या किसी भी बड़ी प्राकृतिक आपदा या उग्रवादी हिंसा में मारे गए लोगों की कुल संख्या से भी अधिक है, जो इस खतरे की गंभीरता को स्पष्ट करती है.
झारखंड में ही क्यों गिरती है इतनी बिजली
विशेषज्ञों के मुताबिक, छोटानागपुर का पठारी क्षेत्र समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर स्थित है और यहां लौह अयस्क सहित विभिन्न खनिजों की प्रचुरता पाई जाती है. मिट्टी में मौजूद ये खनिज तत्व बिजली को तेजी से अपनी ओर आकर्षित करते हैं. इसके अलावा, तेजी से हो रही जंगलों की कटाई के कारण अब बिजली को ग्राउंड होने के लिए पर्याप्त ऊंचे पेड़ नहीं मिलते हैं. यही कारण है कि वज्रपात की घटनाएं सीधे इंसानों और मवेशियों पर गिरने का खतरा बढ़ा रही हैं, जिससे जान-माल का नुकसान लगातार बढ़ रहा है.
