कोडरमा: जिले में स्थित ‘कोडरमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी इन दिनों खनन माफियाओं की गिरफ्त में है. सेंचुरी के छतरबर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध माइका (अभ्रक) खनन ने न केवल पर्यावरण को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है, बल्कि बेजुबान वन्यजीवों के अस्तित्व पर भी गहरा संकट खड़ा कर दिया है. रामगोविंद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी से महज दो किलोमीटर की दूरी से शुरू होकर लगभग आठ किलोमीटर के दायरे में खनन माफियाओं ने अपना साम्राज्य फैला लिया है. सूत्रों के अनुसार, इस घने जंगल के भीतर 50 से अधिक अवैध खदानें संचालित की जा रही हैं. यह पूरा इलाका ‘वन्य प्राणी आश्रयणी’ के रूप में अधिसूचित है. यहां किसी भी प्रकार की गैर-वानिकी गतिविधि, निर्माण या उत्खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है. बावजूद इसके, जंगल की शांति को दिन-रात होने वाले विस्फोटों और भारी मशीनों के शोर ने भंग कर दिया है.
इन क्षेत्रों में फैला है अवैध खनन का जाल:
माफियाओं ने छतरबर से लेकर बिहार सीमा पर स्थित दिबौर और झरकी विशनपुर तक के बड़े इलाके को खोद डाला है. जयंती, बुढ़िया, लकरमंदवा, खैरा, तुमरईया, बंडा और ललकी माइंस. इन खदानों से निकाला गया कीमती माइका अवैध रास्तों से छतरबर, पुतो, बेकोबार, डुमरीडीहा रोड और मोरियावां स्थित गुप्त गोदामों तक बेखौफ भेजा जा रहा है.
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कोर्ट के निर्देशों की भी अनदेखी:
इस क्षेत्र की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि झारखंड उच्च न्यायालय ने वन्यजीवों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए कोडरमा-रजौली एनएच-20 के एलाइनमेंट (रास्ता) तक को बदलने का निर्देश दिया है। कोर्ट की इतनी सख्त टिप्पणी और सुरक्षा चिंताओं के बावजूद, जमीन पर धड़ल्ले से चल रहा अवैध खनन प्रशासन की मुस्तैदी पर बड़े सवालिया निशान खड़े करता है.
