रांची: झारखंड में विकास की रफ्तार फाइलों और जमीनी विवादों के बीच हिचकोले खा रही है. राज्य की कई ऐसी लाइफलाइन परियोजनाएं हैं, जिन्हें वर्षों पहले पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन आज वे सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक लेट-लतीफी का नमूना बन चुकी हैं. आलम यह है कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, इन योजनाओं की लागत दोगुनी से अधिक हो गई है. पर जनता को मिलने वाला लाभ अब भी कोसों दूर है. सिंचाई से लेकर परिवहन तक, राज्य की ये महत्वपूर्ण योजनाएं अपनी पूर्णता के लिए तारीख-पर-तारीख का इंतजार कर रही हैं. इन योजनाओं के अटकने का मुख्य कारण 60 फीसदी मामलों में भूमि अधिग्रहण, 25 फीसदी में वन विभाग की स्वीकृति और 15 फीसदी में फंड का समय पर रिलीज नहीं होना है.
ये मेगा प्रोजेक्ट्स जो अधर में
पुनासी जलाशय परियोजना (देवघर): लगभग 42 साल पुरानी यह योजना अब भी अधूरी है.शुरुआत में इसकी लागत महज 26 करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर 1100 करोड़ रुपये के पार जा चुकी है. मुख्य बांध का काम लगभग पूरा है, लेकिन नहरों के लिए भूमि अधिग्रहण और वन विभाग की एनओसी का पेंच अभी भी फंसा हुआ है.
कनहर बराज परियोजना (गढ़वा): उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के त्रिकोण पर स्थित यह योजना दशकों से लंबित है.इसका उद्देश्य 1 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि की सिंचाई करना था. वर्तमान में काम की रफ्तार इतनी धीमी है कि इसके 2027 तक भी पूरा होने पर संशय है. विस्थापितों के मुआवजे का मुद्दा और अंतर्राज्यीय जल विवाद इसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है.
रांची स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट (धुर्वा): देश के 100 स्मार्ट शहरों में शामिल रांची का यह प्रोजेक्ट ‘ग्रीनफील्ड’ मॉडल पर आधारित है, लेकिन बुनियादी ढांचे के बाद निजी निवेश में यह काफी पीछे है.कुल 656 एकड़ जमीन पर विकसित होने वाले इस प्रोजेक्ट में अब तक कई प्लॉटों की नीलामी सफल नहीं हो पाई है. संस्थागत भवनों के अलावा कमर्शियल और आवासीय हब का निर्माण अभी भी शुरुआती चरण में है.
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स्वर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजनाः इसे झारखंड की सबसे बड़ी सिंचाई योजना माना जाता है, जो 1970 के दशक से चल रही है.इसकी अनुमानित लागत 6,000 करोड़ से अधिक हो चुकी है. ओडिशा और पश्चिम बंगाल के साथ समन्वय और भूमि अधिग्रहण के कारण चांडिल डैम से जुड़ी नहरों का जाल अब तक पूरा नहीं बिछाया जा सका है.
कोयल-कारो जलविद्युत परियोजना: राज्य की सबसे विवादित और अब लगभग ठंडे बस्ते में जा चुकी योजना है.710 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य था. भारी जन-विरोध और विस्थापन नीति स्पष्ट न होने के कारण यह प्रोजेक्ट वर्षों से डेड लॉक की स्थिति में है, जबकि इस पर शुरुआती करोड़ों रुपये व्यय किए जा चुके हैं.
साहेबगंज मल्टी-मोडल टर्मिनल (फेज टू): गंगा नदी पर बना यह टर्मिनल जलमार्ग विकास के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन कनेक्टिविटी (सड़क और रेल लिंक) की कमी के कारण यह अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है.यहां 290 करोड़ का निवेश प्रथम चरण में हुआ है, लेकिन औद्योगिक कॉरिडोर न बन पाने से स्थानीय रोजगार के आंकड़े शून्य के करीब हैं.
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