Ranchi: झारखंड का प्रशासनिक अमला इस समय डिजिटल डिटॉक्स पर नहीं, बल्कि डिजिटल तरीके से छिपने की प्रक्रिया में है. ट्रेजरी घोटाले की फाइलों ने जो धूल उड़ाई है, उसने साहबों के चेहरे का नूर और मोबाइल का डेटा, दोनों उड़ा दिया है.
अब देखना यह है कि यह फेस-ऑफ वाली चतुराई, जांच के आमने-सामने होने पर कितनी काम आती है. प्रोजेक्ट भवन की ऊंची दीवारों से लेकर नेपाल हाउस की पुरानी फाइलों के बीच एक अजीब सी बेचैनी पसरी हुई है. साहबों की चिंता घोटाले की जांच से ज्यादा इस बात को लेकर है कि कहीं उनकी डिजिटल कुंडली कोई बांच न ले.
कोई स्क्रीनशॉट न ले ले…
एक बड़े साहब ने तो अपने खास मातहत को मैसेज किया. कहा, वो ट्रेजरी वाली फाइल का नोटिंग देख लेना, कहीं मेरा साइन तो डार्क नहीं दिख रहा? जवाब आने से पहले ही साहब ने मैसेज डिलीट कर दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं कोई स्क्रीनशॉट न ले ले.
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व्हाट्सएप पर ‘डिलीट फॉर एवरीवन’ की बाढ़
सचिवालय के गलियारों में अब जय जोहार के बाद पहला सवाल यह नहीं होता कि काम कैसा चल रहा है, बल्कि दबी आवाज में पूछा जाता है, भैया, व्हाट्सएप सुरक्षित है न? अफसरों के बीच इन दिनों मैसेज भेजने और उसे तुरंत डिलीट करने की होड़ मची है. कोई अधिकारी किसी दूसरे से जानकारी मांग रहा है, तो कोई पुराने लेन-देन के रिकॉर्ड को हवा में गायब करने की जुगत में है.
फेस-ऑफ का नया बुखार, सुरक्षित कॉल का मायाजाल
अफसरों को अब नॉर्मल कॉल या व्हाट्सएप कॉल पर भरोसा नहीं रहा. सचिवालय में चर्चा है कि अब फेस-ऑफ आईडी के जरिए टोह लेने का खेल चल रहा है. अफसरों की नजर में यह आईडी सुपर सेफ है. सचिवालय की गलियारों में चलते हुए अफसर मोबाइल कान से सटाए नहीं, बल्कि उसे फेस-ऑफ मोड में रखकर फुसफुसाते नजर आते हैं. मकसद सिर्फ एक ही है कि जांच की आंच किस तरफ मुड़ रही है? अगला नंबर किसका है? और क्या पुरानी फाइलों में कोई लूपहोल तो नहीं छूट गया.
टोह लेना ही बन गया फुल टाइम जॉब
प्रोजेक्ट भवन के गलियारों में यह जुमला आजकल खूब चल रहा है, काम हो न हो, पर जानकारी पूरी होनी चाहिए. अफसर एक-दूसरे को कॉल करके हाल-चाल कम और जांच की प्रगति ज्यादा पूछ रहे हैं. “कुछ सुना क्या…” ये तीन शब्द सचिवालय का नया ट्रेंड बन गया है.
