रांचीः भारतीय संगीत जगत की जीवंत किंवदंती और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित आशा भोंसले का झारखंड (तत्कालीन बिहार का हिस्सा) से नाता काफी पुराना और भावनात्मक रहा है. आशा ताई की जादुई आवाज ने न केवल बड़े पर्दे पर धूम मचाई, बल्कि झारखंड के औद्योगिक और सांस्कृतिक मंचों पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी. चाहे वह धनबाद के कोयलांचल की शाम हो या रांची की सुहानी फिजा, आशा भोंसले ने जब-जब यहां कदम रखे, संगीत प्रेमियों के लिए वह पल ऐतिहासिक बन गए. झारखंड प्रवास के दौरान आशा भोंसले अपनी सादगी के लिए जानी गईं. उन्हें स्थानीय व्यंजनों और यहां की हरियाली से विशेष लगाव रहा.
झारखंड के प्रमुख दौरे और कार्यक्रम
आशा भोंसले का झारखंड से जुड़ाव मुख्य रूप से उनके लाइव कन्सर्ट और सामाजिक आयोजनों के जरिए रहा है. धनबाद (कोयलांचल) में ऐतिहासिक कार्यक्रम 1980 के दशक में हुआ था. आशा भोंसले का झारखंड के प्रति प्रेम तब चर्चा में आया जब उन्होंने धनबाद के नेहरू स्टेडियम (जीके ग्राउंड) में एक विशाल संगीत कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. उस रात पूरा धनबाद सड़क पर उतर आया था. उन्होंने अपने प्रसिद्ध गीतों दम मारो दम और पिया तू अब तो आजा से कोयलांचल की जनता को मंत्रमुग्ध कर दिया था.
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रांची में भी आशा ताई ने अपनी सुरीली उपस्थिति दर्ज कराई
राजधानी रांची में भी आशा ताई ने अपनी सुरीली उपस्थिति दर्ज कराई। वे निजी कार्यक्रमों और कुछ बड़े पुरस्कार समारोहों के सिलसिले में रांची आईं. रांची के जिमखाना क्लब और स्थानीय ऑडिटोरियम्स में उनके आगमन की स्मृतियां आज भी कला प्रेमियों के जेहन में ताजा हैं.झारखंड के स्थानीय कलाकारों और संगीत मंडलियों के लिए उनका प्रवास हमेशा प्रेरणादायक रहा. उन्होंने यहां की मेहमाननवाजी और यहां के प्राकृतिक सौंदर्य की भी सराहना की थी.
जमशेदपुर से जुड़ाव
लौहनगरी जमशेदपुर, जो अपनी सांस्कृतिक सक्रियता के लिए जानी जाती है, वहां भी आशा भोंसले के गीतों की शाम सजी थी. टाटा स्टील के कुछ बड़े आयोजनों में पार्श्व गायकों की फेहरिस्त में आशा भोंसले का नाम प्रमुखता से शामिल रहा है.आशा भोंसले के कार्यक्रम केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि उन्होंने मुंबई के बॉलीवुड संगीत और झारखंड के सुदूर क्षेत्रों के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का काम किया.
