अलविदा माधो बाबू!

Shambhunath Chaudhry Ranchi: माधव लाल सिंह नहीं रहे. गोमिया से चार बार विधायक रहे, बिहार और झारखंड सरकार में मंत्री भी बने,...

Shambhunath Chaudhry 

Ranchi: माधव लाल सिंह नहीं रहे. गोमिया से चार बार विधायक रहे, बिहार और झारखंड सरकार में मंत्री भी बने, लेकिन जिस मिट्टी से उनका रिश्ता था और जिन लोगों के दिलों में वे बसते थे, उनके लिए वे सिर्फ माधव लाल सिंह नहीं, ‘माधो बाबू’ थे.

करीब छह फुट लंबा कद, गौर वर्ण चेहरा और ललाट पर सजा चौड़ा गोल लाल टीका… भीड़ में भी उनकी मौजूदगी अपनी एक अलग पहचान बना लेती थी. पिछले कुछ वर्षों से उनसे सक्रिय संपर्क कम रहा, लेकिन एक समय ऐसा था जब उनसे आत्मीय रिश्ता हुआ करता था.

उन दिनों मैं ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में था और दफ्तर में उनका आना-जाना अक्सर लगा रहता था. आज भी वे दिन याद आते हैं… माधो बाबू का दफ्तर में आना किसी हलचल से कम नहीं होता था. वे आते ही सीधे संपादक हरि जी के केबिन में पहुंचते और वहीं से अपनी उस रौबीली और खनकती आवाज में पुकार लगाते…“का हो शंभु बाबू… कहां गेलाय?” कभी किसी कारणवश उनकी कोई खबर अखबार में नहीं छपती, तो फोन पर उसी अधिकार से शिकायत भी करते.. “खबरवा बतैलियो हल… से काहे नाय छपलो?”

फोन पर उनसे बात करना भी अपने आप में एक अलग अनुभव था. वे उस दौर के नेता थे जब ट्रंक कॉल के दौरान ऊंची आवाज में बात करना आदत हुआ करती थी, शायद इसीलिए वे मोबाइल के इस दौर में भी फोन पर उसी ऊंची आवाज में बात करते थे.

माधव बाबू जनता के बीच से निकले हुए असल ‘माटी के लीडर’ थे. वे उस राजनीति के प्रतिनिधि थे जहां दिखावा कम और सरोकार ज्यादा होते थे. उनके दरवाजे तक पहुंचने के लिए किसी अपॉइंटमेंट की जरूरत नहीं. गोमिया, पेटरवार, कसमार, गोला, रामगढ़ और बोकारो के इलाकों में लोग उन्हें माधव लाल सिंह से ज्यादा “माधो बाबू” के नाम से जानते थे. यह नाम किसी पीआर एजेंसी या राजनीतिक ब्रांडिंग की देन नहीं था, बल्कि जनता के निश्छल प्यार से उपजा था.

उनकी राजनीति किसी पार्टी मुख्यालय से नहीं, बल्कि साड़म गांव के उस बजरंगबली मंदिर से शुरू हुई थी, जहां 1985 में जनता ने उन्हें चुनाव लड़ाने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई से चंदा दिया था. तब बाहुबल और धनबल के खिलाफ जनता ने अपने इस ‘माधो’ को नोटों की माला पहनाकर विधानसभा भेजा था. आज की चकाचौंध वाली ‘कॉरपोरेट राजनीति’ में यह किसी लोककथा जैसा लगता है कि किसी प्रत्याशी के पास नामांकन के 250 रुपये न हों और पूरी जनता उसे अपने कंधों पर उठा ले.

साल 2014 के बाद वे लगातार तीन चुनाव हारे, लेकिन इन पराजयों ने कभी उनकी शख्सियत को छोटा नहीं किया. वे राजनीति की जिस ‘पुरानी शैली’ के पक्षधर थे, वह शायद आज के समीकरणों और प्रबंधन वाली सियासत के शोर में पीछे छूट गई थी. पर माधो बाबू ने खुद को नहीं बदला. वे अंत तक वही ‘माधो बाबू’ रहे, जिन्हें क्षेत्र का हर छोटा-बड़ा शख्स अपना अभिभावक मानता था.

मंत्री बने, लेकिन भीतर का ‘इंसान’ कभी नहीं बदला. वह कभी प्रोटोकॉल के कैदी नहीं रहे.

मुझे आज भी विधानसभा में दिया गया उनका वह बयान याद आता है, जब उन्होंने विधायकों को ललकारते हुए कहा था “अगर हम सच में ईमानदार हैं, तो सदन में अपने बेटे-बेटियों की कसम खाएं कहें कि बिना लालच के झारखंड के लिए काम करेंगे.”

समय बदला, राजनीति की भाषा और व्याकरण बदल गया, लेकिन माधो बाबू आखिरी समय तक उसी पुरानी मूल्य-आधारित राजनीति के सिपाही बने रहे, जिसमें व्यक्ति की पहचान उसके ‘काफिले’ से नहीं, बल्कि उसके ‘चरित्र’ से होती थी. आज लोग सिर्फ एक पूर्व मंत्री को याद नहीं कर रहे, बल्कि उस दौर को याद कर रहे हैं जब सियासत में इंसानियत की जगह बची हुई थी.

माधो बाबू चले गए, लेकिन उनकी सादगी हमेशा जेहन में जिंदा रहेगी.

बड़े मसरूफ लगते हो जमाने की सियासत में,

मगर सादगी ऐसी कि बस इंसान लगते हो…”

गोला, पेटरवार, गोमिया और कसमार की पगडंडियां आज अपने उस बेबाक जननेता को याद कर सुबक रही होंगी.

माधो बाबू का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि राजनीति के उस दौर का विदा होना है जहां सादगी और भरोसा ही सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी हुआ करती थी.

अलविदा माधो बाबू! आपकी वो खनकती आवाज हमेशा याद आएगी.

(शंभूनाथ चौधरी झारखंड के वरिष्ठ पत्रकारों में से एक हैं, फिलहाल वो रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं)

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