Koderma: अभ्रक उद्योग की बदहाली के बीच ढिबरा चुनने पर लगी रोक से कोडरमा-गिरिडीह के लाखों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. वन संरक्षण कानून 1980 के बाद बंद हुई खदानों के मलबे से निकलने वाले ढिबरा से ही एक हजार से अधिक गांवों के करीब 3 लाख लोग जीवन यापन करते हैं.
क्या है पूरा मामला
बिहार माइका एक्ट 1947 की धारा 3 के तहत 6 स्क्वायर इंच तक के अभ्रक टुकड़े पर रोक नहीं थी. इसी कारण 35 सालों तक ढिबरा चुनाई और व्यापार बिना बाधा चलता रहा. 2015 में रघुवर दास सरकार के समय ढिबरा डंपों की नीलामी शुरू हुई, लेकिन वह विफल रही. इसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई तेज हो गई.
सीएम हेमंत सोरेन ने ढ़िबरा लदा वाहन को हरि झंडी दिखाकर किया था रवाना
2019 में हेमंत सोरेन सरकार ने लघु खनिज नियमावली में संशोधन कर ढिबरा व्यापार को वैधता दी. मजदूरों की को-ऑपरेटिव सोसाइटी को चुनाई का अधिकार और जेएसएमडीसी को नीलामी का अधिकार मिला. 17 जनवरी 2023 को तत्कालीन सीएम ने काम का उद्घाटन भी किया था.
अब फिर लगी रोक
आरोप है कि केंद्र के परमाणु ऊर्जा विभाग ने लिथियम की संभावना के हवाले से ढिबरा काम पर रोक लगा दी है. विभाग को एक साल पहले सैंपल भेजे गए, लेकिन रिपोर्ट अब तक नहीं आई. स्थानीय व्यापारियों और मजदूरों का प्रतिनिधिमंडल कोडरमा की सांसद और केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी से मिला, लेकिन समस्या का समाधान नहीं निकला.
राजनीतिक बयानबाजी तेज
आरोप लगाया गया है कि लिथियम के नाम पर अदाणी-अंबानी जैसे कारपोरेट घराने दुनिया की सबसे बेहतरीन क्वालिटी के अभ्रक भंडार पर कब्जा करना चाहते हैं. कहा गया कि अगर ऐसा हुआ तो जंगल उजड़ेंगे और लाखों लोग बेरोजगार होंगे.
इंडिया गठबंधन के पूर्व उम्मीदवार विनोद कुमार सिंह बताते हुए अपील की है कि मतदाता ऐसे सांसद को चुनें जो अभ्रक उद्योग को बचा सके. वहीं भाजपा पर ढिबरा मुद्दे पर मौन रहने का आरोप है. अब देखना होगा कि प्रशासन और केंद्र सरकार इस गतिरोध को कब तक दूर करती है.
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