Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो जिला के चंदनकियारी थाना क्षेत्र में वर्ष 2003 में हुए एक हमले और कथित आगजनी के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने मामले के सात आरोपियों में से छह को सभी आरोपों से बरी कर दिया जबकि सिर पर फावड़े से जानलेवा वार करने वाले मुख्य आरोपी अनंत मांझी की हत्या के प्रयास के तहत दोषसिद्धि और सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा को बरकरार रखा है. अदालत ने अनंत मांझी की जमानत रद्द करते हुए उसे दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर शेष सजा काटने का निर्देश दिया है. समय पर सरेंडर न करने की स्थिति में ट्रायल कोर्ट को उसके खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है.
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के मुताबिक 18 अगस्त 2003 को पूर्व से चल रहे एक मुकदमे में समझौता कराने का दबाव बनाने के उद्देश्य से आरोपियों ने अश्विनी मांझी के घर को घेर लिया था. आरोपियों ने उसके घर में आग लगा दी और जब अश्विनी मांझी भागने लगा तो अनंत मांझी ने फावड़े से उसके सिर पर वार कर दिया जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया. वर्ष 2005 में ट्रायल कोर्ट ने सभी सात आरोपियों को दंगा, आगजनी और हत्या के प्रयास का दोषी ठहराया था. सुनवाई के दौरान मामले के रिकॉर्ड और साक्ष्यों को देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने न तो किसी स्वतंत्र गवाह का बयान लिया न ही यह स्पष्ट किया कि मकान का कौन सा हिस्सा जला. जली हुई सामग्री को साक्ष्य के रूप में भी प्रस्तुत नहीं किया गया था. अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी किसी साझा उद्देश्य (कॉमन ऑब्जेक्ट) से इकट्ठा हुए थे. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल घटनास्थल पर मौजूदगी किसी को गैरकानूनी जमावड़े का सदस्य नहीं बनाती. गवाहों के बयान से यह स्पष्ट था कि अनंत मांझी ने ही फावड़े से सिर पर गंभीर चोट पहुंचाई थी. डॉक्टरों के मुताबिक अगर समय पर इलाज न मिलता तो घायल की जान जा सकती थी। इस आधार पर कोर्ट ने अनंत मांझी के खिलाफ धारा 307 के तहत अपराध सिद्ध माना और उसकी सजा कायम रखी जबकि बाकी छह आरोपियों को जमानत बंधपत्रों से मुक्त कर दिया.
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