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26 साल में कुर्सी बदली, चेहरे बदले, पर युवाओं की बर्बादी का दौर नहीं बदला, डिग्री हाथ में, लाठियां पीठ पर, इंटरनेट भी बंद हुआ, विधानसभा से शुरू हुआ था अवैध नियुक्ति का खेल

Ranchi: झारखंड गठन के बाद से राज्य में कई सरकारें आईं और गईं, निर्दलीय विधायक ने भी मुख्यमंत्री की कमान संभाली. बेहतर...

JPSC-JSSC
एआई सांकेतिक तस्वीर

Ranchi: झारखंड गठन के बाद से राज्य में कई सरकारें आईं और गईं, निर्दलीय विधायक ने भी मुख्यमंत्री की कमान संभाली. बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर राज्य में दो-दो उपमुख्यमंत्री तक बनाए गए. झारखंड की राजनीतिक प्रयोगशाला में एक से बढ़कर एक प्रयोग किए गए, लेकिन राज्य के युवाओं के भविष्य को संवारने वाली दो सबसे अहम संस्थाओं झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग की कार्यशैली में सुधार नहीं ला पाया. इन संस्थाओं के जन्म के साथ ही भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवादों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

विधानसभा से शुरू हुआ अवैध नियुक्तियों का खेल

झारखंड में नियुक्ति और प्रोन्नति को लेकर भ्रष्टाचार की शुरुआत सबसे पहले खुद विधानसभा से हुई थी. 1 फरवरी 2012 को तत्कालीन राज्यपाल सैयद अहमद ने नियुक्तियों और प्रोन्नति पर गंभीर सवाल उठाते हुए विधानसभा को एक पत्र भेजा था, जिसमें इन नियुक्तियों की उच्चस्तरीय जांच कराने के निर्देश दिए गए थे. राज्यपाल का यह पत्र तत्कालीन स्पीकर सीपी सिंह को प्राप्त हुआ था. जब स्पीकर ने राज्यपाल से कहा कि वे चाहें तो खुद इसकी जांच करा लें, तो राज्यपाल ने जांच आयोग के गठन का निर्देश जारी किया. राज्य सरकार द्वारा पूर्व न्यायाधीश लोकनाथ प्रसाद की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया गया. राज्यपाल ने 30 बिंदुओं के आधार पर नियुक्ति और प्रोन्नति में हुई गड़बड़ियों की जांच के आदेश दिए थे.

राज्यपाल ने इन बिंदुओ पर उठाया था सवाल

• क्या नियुक्ति व प्रोन्नति में खुलेआम पिक एंड चूज पद्धति अपनाई गई?
• क्या विज्ञापनों में रिक्त पदों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया था और बिना पदों की संख्या के जारी किया गया विज्ञापन कानूनन वैध है?
• क्या तैयार की गई मेधा सूची में कई रोल नंबरों पर स्पष्ट रूप से ओवरराइटिंग की गई है?
• क्या पलामू के 13 अभ्यर्थियों को उनके स्थायी पते पर डाक द्वारा पत्र भेजा गया और वह पत्र महज 12 घंटे के भीतर ही मिल गया?
• क्या सफल उम्मीदवारों ने महज दो दिनों के भीतर ही अपनी सेवा में योगदान कर दिया?
• क्या अनुसेवक के लिए निर्धारित नियुक्ति प्रक्रिया के तहत चयनित व्यक्तियों को अवैध रूप से ‘ऑर्डर्ली’ के रूप में नियुक्त कर लिया गया?
• क्या गठित नियुक्ति कोषांग में कौशल किशोर प्रसाद और सोनेत सोरेन को शामिल किया गया, जिनके खिलाफ पूर्व स्पीकर एमपी सिंह ने पहले ही प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं?
• तत्कालीन सचिव सह साक्षात्कार कमेटी के अध्यक्ष व सदस्य कौशल किशोर प्रसाद विधानसभा सत्र में व्यस्त थे और पूरी अवधि के दौरान टाइपिंग शाखा के नारायण सिंह इसमें शामिल रहे, जिसके बाद भी साक्षात्कार कमेटी के सदस्यों ने आंख मूंदकर हस्ताक्षर कर दिए.

JPSC: स्थापना के साथ ही विवादों और घोटालों की भेंट

विधानसभा के बाद JPSC की पहली ही परीक्षा से भ्रष्टाचार का खेल विधिवत शुरू हो गया. JPSC ने 1 दिसंबर 2002 को प्रथम संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से 64 डिप्टी कलेक्टरों की भर्ती की थी. जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि चयन प्रक्रिया के हर स्तर पर विशेषकर प्रारंभिक परीक्षा के समय अतिरिक्त उम्मीदवारों को सफल घोषित करके आयोग द्वारा तय मानदंडों की धज्जियां उड़ाई गई.

प्रारंभिक परीक्षा में भारी गोलमाल: नियमों के तहत पीटी परीक्षा (PT Exam) में केवल 665 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जाना था, लेकिन नियमों को ताक पर रखकर 9,488 अभ्यर्थियों को सफल घोषित कर दिया गया. मूल्यांकनकर्ताओं का कोई आधिकारिक पैनल तक तैयार नहीं किया गया था.

मुख्य परीक्षा में भी नियमों की अनदेखी: JPSC के तय मानदंडों के विरुद्ध मुख्य परीक्षा में 196 की जगह 246 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया गया. साक्षात्कार के लिए भी जरूरत से ज्यादा उम्मीदवारों को बुलाया गया.

नतीजों का हस्र: आयोग ने अंततः 64 का चयन किया. इनमें से दो अभ्यर्थियों अजय लिंडा और नीलम अग्रवाल ने सेवा छोड़ दी, जबकि कुमान मनीष और मेघना रूबी कच्छप का निधन हो चुका है. शेष बचे अभ्यर्थी राज्य सरकार में विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं.

तारीख से पहले कॉपियों का मूल्यांकन: कॉपियों का मूल्यांकन चुनिंदा परीक्षकों से कराया गया, जहां परीक्षकों द्वारा उत्तर पुस्तिकाओं की प्राप्ति की तारीख, मूल्यांकनकर्ताओं को कॉपियां सौंपने की तारीख से भी पहले की दर्शाई गई. उत्तर पुस्तिकाओं में बड़े पैमाने पर कटिंग और ओवरराइटिंग मिली. कॉपियों को परीक्षकों के निजी वाहनों से भेजा गया और उनसे कोई पावतीतक नहीं ली गई.

JPSC परीक्षाओं का काला इतिहास

• पहली संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2003): चयन प्रक्रिया में खुला पक्षपात और मेरिट लिस्ट में भारी गड़बड़ी के आरोप.
• दूसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2003-05): पहली परीक्षा की तर्ज पर चयन और इंटरव्यू प्रक्रिया पर गंभीर सवाल.
• तीसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2007-08): परिणाम, मूल्यांकन और चयन प्रक्रिया के खिलाफ अदालत में ताबड़तोड़ याचिकाएं दायर हुईं.
• चौथी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2009): इंटरव्यू और फाइनल मेरिट सूची को लेकर विवाद और न्यायिक चुनौतियां.
• पांचवीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2012): आरक्षण के प्रावधानों, उत्तर कुंजी और चयन प्रक्रिया पर अभ्यर्थियों की कड़ी आपत्तियां.
• छठी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2016): परिणामों में अत्यधिक देरी, आंसर की और कॉपियों के मूल्यांकन को लेकर लंबा विवाद और मुकदमे.
• 7वीं-10वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2021-22): बैकलॉग के नाम पर आयोजित इस परीक्षा में एक ही केंद्र से सीरियल रोल नंबर वाले दर्जनों अभ्यर्थियों के चयन, ओएमआर शीट में छेड़छाड़ और मूल्यांकन में गड़बड़ी के गंभीर आरोपों पर युवाओं पर लाठियां बरसाई गईं.
• 11वीं-13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (2023-24): तीन परीक्षाओं को क्लब करके 342 पदों पर नियुक्तियां तो कर ली गईं, लेकिन नियमों की अनदेखी और पारदर्शिता के अभाव पर सवाल बने रहे.
• 14वीं संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा (2026): विज्ञापन संख्या 01/2026 के तहत 19 अप्रैल 2026 को 103 पदों के लिए पीटी हुई. जुलाई 2026 में जब रिजल्ट आया तो भूचाल मच गया. आयोग ने पारदर्शी तरीके से कट-ऑफ मार्क्स तक जारी नहीं किए, OMR मूल्यांकन में धांधली का आरोप लगा, जिसके चलते मुख्य परीक्षा समेत 9 परीक्षाएं टालनी पड़ गईं.

JSSC: नौकरशाहों के हाथों में सुरक्षित समझी जाने वाली व्यवस्था का पतन

झारखंड के युवाओं की तकदीर लिखने की जिम्मेदारी जिस झारखंड कर्मचारी चयन आयोग के कंधों पर है, उसका विवादों से गहरा नाता रहा है. राज्य के सबसे बड़े प्रशासनिक पदों यानी IAS और IPS अधिकारियों की फौज ने समय-समय पर इस आयोग की कमान संभाली, लेकिन नतीजा हमेशा सिफर रहा.

आयोग की कुर्सी पर बैठने वाले प्रमुख कमांडर

• मृदुला सिन्हा (IAS, सेवानिवृत): आयोग की प्रथम अध्यक्ष.
• सुधीर त्रिपाठी (IAS, सेवानिवृत्त): नवंबर 2020 में कमान संभाली.
• नीरज सिन्हा (पूर्व DGP): सितंबर 2023 में एक आईपीएस अधिकारी को कमान मिलने पर सख्ती की उम्मीद थी, लेकिन पेपर लीक के के कारण इन्हें इस्तीफा देना पड़ा.
• डॉ. मनीष रंजन (IAS): अप्रैल 2025 में अध्यक्ष पद संभाला, लेकिन व्यवस्था पटरी पर नहीं लौटी.
• प्रशांत कुमार (IAS): वर्तमान में इस खस्ताहाल आयोग के प्रभारी अध्यक्ष के रूप में कमान संभाल रहे हैं.

JSSC की परीक्षाओं के वे कारनामे, जिन्होंने व्यवस्था की पोल खोल दी

फील्ड वर्कर प्रतियोगी परीक्षा 2024: विज्ञापन जारी होने के पूरे दो साल बाद 19 जुलाई को यह परीक्षा कराई गई. प्रशासनिक लापरवाही की हद तब हो गई जब अभ्यर्थियों को परीक्षा केंद्र उनके घरों से 300 से 550 किलोमीटर दूर थमा दिए गए. तकनीकी गड़बड़ियों और आवागमन के साधनों के अभाव में लगभग 75% अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल ही नहीं हो सके. कई उम्मीदवारों को तो परीक्षा हॉल के भीतर या परीक्षा समाप्त होने के बाद ईमेल पर एडमिट कार्ड के संदेश मिले! संताली भाषा के पेपर में पाठ्यक्रम से बाहर के प्रश्न और भारी त्रुटियां मिलने से छात्रों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

उत्पाद सिपाही नियुक्ति परीक्षा 2023: इस परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र लीक होने के पुख्ता और गंभीर आरोप लगे. मामला इतना तूल पकड़ा कि रांची पुलिस को बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए 150 से अधिक छात्रों और दलालों को गिरफ्तार करना पड़ा. तत्कालीन DGP और JSSC अध्यक्ष नीरज सिन्हा के कार्यकाल में हुए इस पेपर लीक ने महकमे की साख को पूरी तरह तार-तार कर दिया, जिसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

स्नातक स्तर संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा (JSSC-CGL): JSSC-CGL का इतिहास विवादों का पर्याय बन चुका है. परीक्षा के दौरान पेपर लीक की अफवाहों और धांधलियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे युवाओं का हुजूम बेकाबू हो गया. स्थिति इतनी भयावह हो गई कि सरकार को परीक्षा के दौरान पूरे राज्य में इंटरनेट सेवाएं तक ठप करनी पड़ीं. यह मामला झारखंड उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा, जिससे देश भर में झारखंड की छवि धूमिल हुई. पेपर लीक के कारण तत्कालीन JSSC अध्यक्ष एवं पूर्व DGP नीरज सिन्हा को अंततः बैकफुट पर आना पड़ा और उन्होंने मुख्य सचिव को अपना इस्तीफा सौंप दिया.

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