Hazaribagh: मानसून की दस्तक के साथ हजारीबाग-बगोदर मार्ग पर टाटीझरिया के रेलओवरब्रिज से लेकर पंडवा नदी के बीच का इलाका इन दिनों प्राकृतिक वनोपज के अस्थायी बाजार में तब्दील हो गया है. सड़क किनारे सजी छोटी-छोटी दुकानों पर जंगलों से लाई गई दुर्लभ मौसमी वन उपज ‘टेकनस’, फुडका, खूंखड़ी (जंगली मशरूम) और बांस करेला खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है. स्थिति यह है कि यहां से गुजरने वाली लग्जरी गाड़ियां भी इन वन उत्पादों की खरीदारी के लिए रुक रही हैं.

टेकनस की सबसे अधिक मांग, कीमत आसमान पर
इन दिनों सबसे अधिक चर्चा ‘टेकनस’ की है. इसकी मांग इतनी अधिक बढ़ गई है कि गुणवत्ता के अनुसार इसका दाम 800 से 1000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है. विक्रेताओं के अनुसार ऊंची कीमत के बावजूद रोजाना कई सौ किलो टेकनस कुछ ही घंटों में बिक जाता है. यही वजह है कि यह वनोपज इस मौसम में ग्रामीणों की आय का सबसे बड़ा सहारा बन गई है.
जंगलों से संग्रह, सड़क किनारे बिक्री
स्थानीय महिला-पुरुष विक्रेताओं का कहना है कि वे आसपास के आदिवासी गांवों और घने जंगलों से इन वन उत्पादों का संग्रह करते हैं. कई लोग इन्हें सीधे जंगलों से चुनकर लाते हैं, जबकि कुछ संग्रहकर्ताओं से खरीदकर सड़क किनारे बेचते हैं. बारिश का मौसम शुरू होते ही यह कारोबार तेज हो जाता है और कई परिवारों की आजीविका इसी पर निर्भर रहती है.
प्राकृतिक स्वाद के साथ पोषण का खजाना
स्थानीय लोगों और खरीदारों का मानना है कि टेकनस समेत अन्य वनोपज पूरी तरह प्राकृतिक होती हैं. इनमें प्रोटीन सहित कई पोषक तत्व और औषधीय गुण पाए जाते हैं. यही कारण है कि लोग इनके स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य लाभ को भी ध्यान में रखकर इन्हें खरीदना पसंद करते हैं.
दूर-दराज से पहुंच रहे खरीदार
टाटीझरिया का यह मौसमी बाजार अब केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है. हजारीबाग, बगोदर और आसपास के कई जिलों से गुजरने वाले यात्री यहां अपनी गाड़ियां रोककर खरीदारी कर रहे हैं. बड़े व्यापारी, अधिकारी और पर्यटक भी इन दुर्लभ वन उत्पादों को खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा सहारा
बारिश के कुछ महीनों तक चलने वाला यह मौसमी कारोबार ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन जाता है. जंगलों से मिलने वाली इन प्राकृतिक उपजों की बढ़ती मांग से स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिल रही है. जानकारों का कहना है कि यदि इन वनोपजों के संग्रह, संरक्षण और विपणन की बेहतर व्यवस्था की जाए तो यह क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार का स्थायी माध्यम भी बन सकता है.
प्रकृति और परंपरा का अनूठा संगम
टाटीझरिया का यह मौसमी बाजार केवल खरीद-बिक्री का केंद्र नहीं, बल्कि जंगल, प्रकृति और स्थानीय संस्कृति का जीवंत उदाहरण भी है. हर वर्ष बारिश के मौसम में यहां लगने वाला यह अस्थायी बाजार लोगों को जंगल की अनमोल सौगातों से रूबरू कराता है और स्थानीय समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली की झलक भी प्रस्तुत करता है.
