रांचीः असम विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा की एंट्री ने सियासी जगत के पंडितों को चौंका दिया है. झामुमो ने 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से 17 पर उनका मुकाबला कांग्रेस से है. इस कदम को कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है. इसकी वजह यह भी है हेमंत सोरेन ने टी-ट्राइब यानि चाय बागान मजदूरों के साथ आदिवासी वोट बैंक पर फोकस किया है, जो असम में एक मजबूत वोट बैंक है.

चाय बगान मजदूरों की आबादी है 70 लाख
असम में चाय बगान मजदूरों की आबादी 45 लाख से 70 लाख के करीब है. इसमें 48 फीसदी झारखंड मूल के हैं. झामुमो ने स्लोगन भी दिया है कि दूरी कितनी भी हो, रिश्ता माटी का है. झामुमो ने वादा किया है कि चाय बागान के श्रमिकों को सम्मान और हक दिलाना है. झामुमो की एंट्री ने असम की राजनीति में एक नया समीकरण जरूर बना दिया है. क्या जेएमएम की रणनीति असम में कांग्रेस और भाजपा के लिए खतरे की घंटी साबित होगी? क्या हेमंत सोरेन की लोकप्रियता जेएमएम को असम में सफलता दिला पाएगी? यह देखना भी दिलचस्प होगा.
क्या है कांग्रेस और भाजपा की चिंता?
कांग्रेस असम में पिछले 10 साल से कमजोर हुई है. हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं के दल-बदल ने कांग्रेस को और कमजोर किया है. अब झामुमो की एंट्री ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है. ऊपरी असम में चाय बागान मजदूर जो झारखंड मूल के हैं, वे हेमंत सोरेन के पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं. भाजपा भी झामुमो की एंट्री से चिंतित है. हालांकि, भाजपा का कहना है कि टी-ट्राइब का वोट बैंक झामुमो के साथ नहीं जाएगा. लेकिन हेमंत सोरेन की लोकप्रियता और झामुमो की रणनीति भाजपा को भी परेशान कर सकती है.
