
गिरिडीह: बदलते दौर में जहां युवा पीढ़ी स्क्रीन तक सिमटती जा रही है, वहीं गिरिडीह से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो उम्मीद और सशक्तिकरण की नई कहानी बयां करती है. शहर में इन दिनों एक सकारात्मक और प्रेरणादायक बदलाव देखने को मिल रहा है. जहां एक ओर आज की पीढ़ी मोबाइल और सोशल मीडिया में अधिक समय बिताने की आदी होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर शहर की सैकड़ों बच्चियां इस ट्रेंड को तोड़ते हुए आत्मरक्षा और परंपरागत शस्त्र कला की ओर कदम बढ़ा रही हैं.
कुटुंब प्रबोधन के तहत खास प्रशिक्षण, 304 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा
कुटुंब प्रबोधन के तहत माता अहिल्याबाई होलकर वाहिनी द्वारा आयोजित इस अनोखे प्रशिक्षण कार्यक्रम में इस वर्ष कुल 304 बच्चियों, महिलाओं और युवतियों ने भाग लिया. दस दिनों तक चले गहन प्रशिक्षण के बाद इन प्रतिभागियों ने शहर के टावर चौक के पास सार्वजनिक रूप से लाठी और तलवार के हैरतअंगेज करतब दिखाए। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने अनुशासन, एकाग्रता और साहस का अद्भुत प्रदर्शन किया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौके पर मौजूद रहे. हर एक करतब पर दर्शकों ने तालियों की गूंज के साथ उनका हौसला बढ़ाया.
आत्मरक्षा के साथ मानसिक मजबूती पर भी दिया गया जोर
इस प्रशिक्षण में बच्चियों को न सिर्फ लाठी और तलवार चलाने की तकनीक सिखाई गई, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनने, आत्मविश्वास बढ़ाने और किसी भी विपरीत परिस्थिति में खुद की रक्षा करने के गुर भी सिखाए गए. प्रशिक्षकों ने बताया कि इस तरह के प्रशिक्षण से बच्चियों में आत्मनिर्भरता की भावना विकसित होती है और वे डर के बजाय साहस के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करना सीखती हैं.
4 साल में 43 से 304 तक पहुंची संख्या, बढ़ी जागरूकता
आयोजकों के अनुसार, यह कार्यक्रम पिछले चार वर्षों से लगातार आयोजित किया जा रहा है और हर वर्ष इसमें प्रतिभागियों की संख्या बढ़ती जा रही है. कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने वाली पूनम बरनवाल ने बताया कि जब इस पहल की शुरुआत हुई थी, तब मात्र 43 बच्चियां इसमें शामिल हुई थीं, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 304 तक पहुंच गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज में अब बेटियों की सुरक्षा और सशक्तिकरण को लेकर जागरूकता तेजी से बढ़ रही है.
सशक्तिकरण ही उद्देश्य, प्रदर्शन नहीं
उन्होंने यह भी बताया कि इस तरह के कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ प्रदर्शन करना नहीं है, बल्कि बच्चियों को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाना है, ताकि वे किसी भी आपात स्थिति में खुद का बचाव कर सकें और समाज में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें.
अगले दिन अखाड़ा में भी होगा प्रदर्शन
कार्यक्रम के अंत में यह भी घोषणा की गई कि अगले दिन सुबह स्थानीय अखाड़ा में भी बच्चियां अपने कौशल का प्रदर्शन करेंगी, जहां और भी अधिक लोग इस अद्भुत प्रतिभा को करीब से देख सकेंगे.
परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनी नई पहचान
इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही दिशा और प्रशिक्षण मिले, तो आज की युवा पीढ़ी न सिर्फ आधुनिकता को अपनाती है, बल्कि अपनी परंपराओं और आत्मरक्षा की कला को भी उतनी ही मजबूती से आगे बढ़ा सकती है.
