हजारीबाग: देश में कानून एक है, लेकिन लागू दो तरीके से होता है एक आम जनता के लिए, दूसरा सत्ता और सिस्टम के खास लोगों के लिए. इन दिनों हजारीबाग शहर और चौपारण, बरही, सदर प्रखंड में रसोई गैस की किल्लत ने हालात बद से बदतर कर दिए हैं. आम लोग सुबह से शाम तक गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनके हिस्से में सिर्फ निराशा आ रही है. वहीं दूसरी तरफ नेता और बड़े अधिकारी बिना लाइन, बिना इंतजार, सीधे वीआईपी सप्लाई का फायदा उठा रहे हैं. सवाल उठता है कि क्या यह वही देश है जहां समानता की बात होती है ? शहर की लगभग हर गैस एजेंसी पर अफरा-तफरी का माहौल है. यही हाल प्रखंडों का भी है. कहीं ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन फेल हो रहा है, तो कहीं रजिस्ट्रेशन के बाद भी सिलेंडर की सप्लाई नहीं मिल रही. महिलाएं, बुजुर्ग और कामकाजी लोग दिनभर कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन गैस खत्म होने की खबर सुनकर खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं. इस संकट के बीच सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि कुछ गैस एजेंसियों के कर्मचारी ही इस आपदा को अवसर में बदलने में जुटे हैं.
ब्लैक मार्केट की शर्मनाक हकीकत
सूत्रों के अनुसार, सिलेंडरों की भारी मात्रा को ब्लैक में बेचा जा रहा है. हालात ऐसे हैं कि एक सिलेंडर की कीमत 2500 से 3000 रुपये तक पहुंच चुकी है, मानो गैस नहीं, स्टॉक मार्केट का शेयर हो जो हर दिन नई ऊंचाई छू रहा हो. झुमरा से भी कालाबाजारी की खबरें आ रही है. उधर, बड़े अधिकारी और नेताओं के घरों में बिना किसी रुकावट के गैस की सप्लाई जारी है. सूत्र बताते है कि स्पेशल कोटा के नाम पर इनकी प्राथमिकता तय कर दी गई है. आम आदमी जहां एक सिलेंडर के लिए तरस रहा है, वहीं खास लोगों के घरों में एक के बाद एक सिलेंडर पहुंच रहे हैं. गैस संकट अब सिर्फ सप्लाई की समस्या नहीं रहा, यह सिस्टम की असमानता और भ्रष्टाचार की खुली पोल बन चुका है. सवाल यह है कि आखिर कब तक आम जनता इस दोहरे कानून का बोझ उठाती रहेगी? क्या प्रशासन इस काला बाजारी पर लगाम लगाएगा या फिर जनता यूं ही लाइन में खड़ी रहकर सिस्टम का मजाक बनती रहेगी? आज जरूरत है जवाबदेही की. वरना यह आग सिर्फ चूल्हे तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि व्यवस्था को भी झुलसा देगी.
