झारखंड के IAS बने गांवों के भाग्यविधाता और बदलाव के नायक

  रांची: झारखंड प्रशासनिक गलियारे में कई ऐसे IAS अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने फाइलों से बाहर निकलकर जमीन पर उतरकर समाज के...

 

रांची: झारखंड प्रशासनिक गलियारे में कई ऐसे IAS अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने फाइलों से बाहर निकलकर जमीन पर उतरकर समाज के लिए मिसाल पेश की है. इन अधिकारियों ने न केवल अपने दायित्वों का निर्वहन किया, बल्कि भावनात्मक लगाव के चलते गांवों और स्कूलों को गोद लेकर उनकी सूरत बदल दी. झारखंड के दुर्गम इलाकों में विकास की लौ जलाने के लिए इन अधिकारियों ने सरकारी बजट के साथ-साथ अपनी व्यक्तिगत रुचि और नवाचार को हथियार बनाया. पेश है न्यूज वेभ की खास रिपोर्ट.

आदित्य रंजन: आंगनबाड़ियों को प्ले स्कूल में बदला

2015 बैच के IAS आदित्य रंजन झारखंड के उन चर्चित अधिकारियों में से हैं जिन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांति ला दी. पश्चिमी सिंहभूम में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने मॉडल आंगनवाड़ी की शुरुआत की और करीब 650 से ज्यादा आंगनबाड़ियों को नया रूप दिया. उन्होंने बिल्डिंग एंड लर्निंग एड तकनीक का इस्तेमाल किया, जहां स्कूल की दीवारों पर पेंटिंग के जरिए बच्चों को शिक्षा दी जाती है. इसके अलावा, उन्होंने युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देने के लिए DIGS कंप्यूटर सेंटर भी शुरू किए.

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गरिमा सिंह: सरकारी स्कूल की सूरत बदलने वाली बेटी

हजारीबाग में पोस्टिंग के दौरान IAS गरिमा सिंह ने एक मिसाल पेश की जिसे आज भी याद किया जाता है. उन्होंने हजारीबाग के मटवारी स्थित आंगनवाड़ी स्कूल को गोद लिया और इसकी मरम्मत के लिए अपनी खुद की सैलरी खर्च की. उनके प्रयास से जर्जर केंद्र आधुनिक स्कूल की तरह चमकने लगा. उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए 1090 हेल्पलाइन को भी सशक्त बनाने में बड़ी भूमिका निभाई.

अमित कुमार: स्मार्ट विलेज की परिकल्पना को साकार किया

IAS अमित कुमार ने सरायकेला-खरसावां और अन्य जिलों में ग्रामीण विकास के कई मॉडल पेश किए. उन्होंने गांवों को गोद लेकर वहां सरकारी योजनाओं को 100% धरातल पर उतारा. उन्होंने डिजिटल साक्षरता पर जोर दिया ताकि गांव के बच्चे भी शहरों की तरह तकनीक से जुड़ सकें. सिंचाई के लिए सोलर पंप और किसानों के लिए उन्नत कृषि तकनीकों को गांव-गांव तक पहुंचाने में उन्होंने व्यक्तिगत रुचि ली.

उमाशंकर सिंह: शिक्षा और कुपोषण के खिलाफ जंग

उमाशंकर सिंह ने जामताड़ा और दुमका जैसे जिलों में शिक्षा सुधार के लिए उल्लेखनीय काम किया. उन्होंने लाइब्रेरी मुहीम को गति दी ताकि सुदूर गांवों के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए शहर न जाना पड़े. कुपोषण दूर करने के लिए उन्होंने सामुदायिक रसोई और स्थानीय पोषण वाटिका को बढ़ावा दिया, जिससे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार हुआ.

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